बू-ए-गुल, रौशनी, रंग, नगमा, सबा
हर हंसी चीज़ है
मेरे जज़्बात के क़त्ल से आशना
सिर्फ तुमको ही नहीं इल्म इस क़त्ल का
मेरा दिल, मेरा महबूब, मासूम दिल
ओढ़कर दाइमी दूरियों का कफ़न
दर्द के दश्त में दफन है
आज भी मेरी हर मुज़्तरिब साँस है
उस पे नौहकना
आज भी याद है मुझको
उस गर्म दोपहर का सानिहा
जब तुम्हारी मुहब्बत के छतनारे से
मेरा दिल, मेरा महबूब, मासूम दिल
एक प्यासे परिंदे की सूरत गिरा
और मेरी तरफ एक नज़र देख कर
इस तरह मर गया,
जैसे इस क़त्ल में मेरा भी हाथ था
सिर्फ तुमको ही नहीं इल्म इस क़त्ल का
बू-ए-गुल, रौशनी, रंग, नगमा, सबा
हर हंसी चीज़ है
मेरे जज़्बात के क़त्ल से आशना
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बू-ए-गुल - फूल की ख़ुशबू
सबा - सुबह
दाइमी - हमेशा
दश्त - जंगल
सानिहा - घटना
आशना - सम्बंधित

बेहतरीन...
प्रत्युत्तर देंहटाएंदाद कबूल करें.
khoobsurat kavita....
प्रत्युत्तर देंहटाएंबहुत खूब सर!
प्रत्युत्तर देंहटाएंसादर
आपको लोहड़ी की हार्दिक शुभ कामनाएँ।
प्रत्युत्तर देंहटाएं----------------------------
कल 13/01/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
धन्यवाद!
आपको भी बहुत बधाई |
हटाएंक्या खूब कहा है..वो बिना खंजर वार भी करते है और अदा से इनकार भी करते हैं..वाह...!
प्रत्युत्तर देंहटाएंखूबसूरत शेर है अमृता जी शुक्रिया|
हटाएंबेहतरीन इमरान भाई...दाद कबूल करें...
प्रत्युत्तर देंहटाएंनीरज
behad sundar,,
प्रत्युत्तर देंहटाएंbahut sorrowful hai but nice as alwayzz :)
प्रत्युत्तर देंहटाएंवाह!!!
प्रत्युत्तर देंहटाएंलाजवाब.
कमेन्ट मोडरेशन में था,,,सो लगा कही गायब हो गया है..इसलिए दोबारा किया:-)
हटाएंकोई बात नहीं विद्या जी कई बार प्रकाशित करने में देर हो जाती है|
हटाएंबहुत सुंदर नज़्म !
प्रत्युत्तर देंहटाएंहमेशा की तरह !
आभार !
बेहतरीन ग़ज़ल....बहुत खूब.....
प्रत्युत्तर देंहटाएं@ आप सभी लोगों का बहुत बहुत शुक्रिया|
प्रत्युत्तर देंहटाएंखूबसूरत नज़्म
प्रत्युत्तर देंहटाएंकल 14/1/2012को आपकी पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
प्रत्युत्तर देंहटाएंधन्यवाद!
शुक्रिया अनुपमा जी|
हटाएंकमाल के शेर हैं .....!!
हटाएंबेहतरीन शायरी ..
वाह....
प्रत्युत्तर देंहटाएंकई बार हमारे ज़ज्बातों का क़त्ल हो जाता है किसी के हाथों और न ही हम इलज़ाम दे पाते हैं,न कातिल को ही इल्म होता है कि उसने क़त्ल किया है,और कई बार मालूम होने पर भी ज़िम्मेदारी लेने को तैयार भी नहीं होता है...क्यूँ कि वो ज़ज्बात हमारे होते हैं..उसके नहीं....!
हाँ,अपने ज़ज्बातों का ढिंढोरा वो सारे जहाँ में ज़रूर बजा आता है...!!
और ज़ज्बातों का क्या है......
वो खामोश ही रहते हैं....
मरते वक़्त ज़रूर
हमें हैरत भरी नज़र से देखते हैं
कि हमने ऐसा होने क्यूँ दिया...!!
वाह....वाह...
इतनी ख़ूबसूरती से क़त्ल होने के बाद भी उकेरा है ज़ज्बातों को आपने...
लाज़वाब! बहुत भावमयी बेहतरीन प्रस्तुति...
प्रत्युत्तर देंहटाएंक्या बात है इमरान भाई आज तो आपने दिल ही निकल कर रख दिया.
प्रत्युत्तर देंहटाएंबेहद उम्दा. जितनी तारीफ करू कम है.
:-))........शुक्रिया जनाब|
हटाएंबहुत खूब इमरान साहब ... गज़ब की नज़्म है ...
प्रत्युत्तर देंहटाएंvAH KYA JAJBAT HAI ......AUR SHABDON KI NAKKASI KE TO KYA KAHANE BHAI .....JEETE RAHO IMRAN BHAI.
प्रत्युत्तर देंहटाएंनवीन जी हम तो सिर्फ एक जरिया हैं दिल के जज़्बात को दिलों तक पहुँचाने का |
हटाएंकाफी अच्छा है.
प्रत्युत्तर देंहटाएंशब्द शब्द कातिल है !
प्रत्युत्तर देंहटाएंबहुत असर कर गया !
बेहतरीन प्रस्तुति !
आभार !
वाह ..बहुत खूब ।
प्रत्युत्तर देंहटाएंबेहतरीन अभिव्यक्ति .............
प्रत्युत्तर देंहटाएंबहुत बहुत शुक्रिया आप सभी का |
प्रत्युत्तर देंहटाएंAapke saare blogs worth following hain... bahut achche achche sankalan... aur shabdaarth likhkar aapne aur bhi achcha kiya hai.. dheron saraahna!!
प्रत्युत्तर देंहटाएंइमरान जी,..बहुत सुंदर नज्म ,बेहतरीन प्रस्तुति,.लाजबाब
प्रत्युत्तर देंहटाएंwelcome to new post...वाह रे मंहगाई
मै अक्सर आपके पोस्ट पर आता रहा हूँ किन्तु आप मेरे पोस्ट पर निवेदन के बाद भी नही आये,..
शुक्रिया धीरेन्द्र जी.......हाँ आप आते रहे हैं अक्सर.......माफ़ कीजिये कई बार समय नहीं मिल पाता आज समय निकाल कर ज़रूर आऊंगा |
हटाएंसबने तो सारी तारीफ़ कर ही दिया है | बहुत उम्दा |
प्रत्युत्तर देंहटाएंशुक्रिया
हटाएंबेहतरीन रचना, शब्द -शब्द बेहतरीन है ..
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