शब्द....किसके हैं ये शब्द?
क्या तेरे, क्या मेरे ?
क्या कभी किसी के हुए हैं ?
ये शब्द.....
इस विराट में शब्द नहीं हैं,
है तो सिर्फ एक नाद
जो अनहत गूँजता है,
और उस नाद को
वर्णित करने के लिए ही तो
शब्दों के वस्त्र बनाते हैं हम,
फिर क्या फर्क है, कि किसी के
वस्त्र उजले हैं, और किसी के स्याह
क्या संसार के शब्दकोश में
कोई भी ऐसा शब्द है,
जो उस अनकहे
को अभिव्यक्ति दे,
क्यों है शब्दों की इतनी अहमियत ?
क्या केवल शब्दों को
क्रम देने से ही
शब्दों पर छाप पड़ जाती है ?
'सर्वाधिकार सुरक्षित' हो जाते हैं ?
कभी सोचा है तुमने की तुम
शब्दों पर अपने अधिकार
को सुरक्षित करते हो ....
क्या सच में तुम ऐसा कर सकते हो ?
क्या कभी कोई उस क्रम को थोड़ा
सा बिगाड़कर, थोड़ा इधर
या थोड़ा सा उधर सरकाकर
तुम्हारे 'सर्वाधिकार' को
'असुरक्षित' नहीं कर देता है
फिर कैसा अधिकार है ये ?
क्या कभी अनुमान किया है
कि इन शब्दों के माध्यम
से ही इस संसार में
प्रतिपल कितनी बकवास
की जाती है ?
कितनो के खिलाफ ज़हर
उगला जाता है?
कितने लोगों को लड़ाया
जाता है ?
अरे जागो,
शब्दों के पीछे मत भागो
ये तो सिर्फ एक जाल है,
शब्द अभिव्यक्ति का मात्र माध्यम हैं
और इन अधिकारों के चक्कर
में तुम वो तो भूल ही जाते हो
जिसको कहने के लिए
इन शब्दों का सहारा लिया गया,
थोड़ा सा गहराई में जाओ.....
थोड़ा सा डूबो उस रस में
जो शब्दों से परे है,
जैसे दिल की धडकन
बिना कहे कुछ कहती है,
जैसे साँसों की गरमी,
जैसे हाथों कि नरमी,
जैसे मतवाले नैनो की बोली
बिना बोले भी बोलती है,
------------------------------------------------------अगर किसी के 'सर्वाधिकार सुरक्षित' में से कोई शब्द भटककर इधर आ निकला हो तो कृपया उसे खींच के यहाँ से ले जाकर सुरक्षित करें :-)
