नवंबर 30, 2013

याद



रात फिर आयी थी याद तेरी 
रोती रही, गिड़गिड़ाती रही 
हिचकियों की आवाज़ें 
मेरे कानों में गूँजती रही   
ज़ेहन की देहरी से लगी तेरी याद 
रात भर सिसकती रही, 

अरसा गुज़र गया है
उस वक़्त को बीते हुए,
पर आज भी तेरी याद 
मेरा पीछा नहीं छोड़ती,   

जब भीड़ में होता हूँ, 
तो ये तनहा कर देती है, 
जब तनहा हूँ तो 
गुज़रे लम्हों का एक 
मज़मा सा लगा देती है,

और फिर मुझे उसी अतल
गहराई में धकेल देती है 
जहाँ अतीत और वर्तमान
के बीच सब धुंधला सा जाता है,

और मैं गुमराह राही सा अनजान 
ये सोच ही नहीं पाता कि 
कौन सा रास्ता अतीत के 
काले अंधेरों में जाकर गुम हो जाता है
और कौन सा वर्तमान के उजियारे में,  

तंग आ गया हूँ अब मैं  
इसकी पिघला देने वाली 
मनुहारों से बचने के लिए, 
अपने ज़ेहन कि कोठरी के 
दरवाज़े मज़बूती से बंद कर दिए,

रात फिर आयी थी याद तेरी 
रोती रही, गिड़गिड़ाती रही 
हिचकियों की आवाज़ें 
मेरे कानों में गूँजती रही   
ज़ेहन की देहरी से लगी तेरी याद 
रात भर सिसकती रही, 

© इमरान अंसारी


नवंबर 26, 2013

कागज़ की नाव



अरमानों को मोड़कर
हसरतो को जोड़कर,
एक कश्ती बनाई थी मैंने
और ये सोच कर पानी में बहा दी
कि एक रोज़ इसे साहिल मिलेगा,
मेरे दिल के किनारे से छूटी ये
कभी तो तेरे दिल के किनारे लगेगी,

वक़्त के तूफान को पर ये मंज़ूर न था 
हालातों के एक ही भंवर ने
आँसूओं का वो सैलाब पैदा किया
जिसमें गर्क हो गई कश्ती मेरी,

मजबूत कश्ती समझा था मैं जिसे 
वो तो फ़क़त कागज़ की नाव थी,
और कागज़ों की नावों के मुक़द्दर में
साहिल नहीं हुआ करते हैं,
उनके नसीब में तो मझधार में
डूब जाना ही लिखा होता है,

© इमरान अंसारी

नवंबर 19, 2013

साहिल



आज भी जा बैठती हूँ 
सागर के उसी साहिल पर 
जहाँ बैठे घंटो हम दूर 
अस्त होते सूरज को 
निहारा करते थे, 

इन लहरों पर कितनी ही 
प्यार भरी अठखेलियाँ 
किया करते थे हम दोनों,

इसी सागर पर किश्ती 
पर बैठे हमने कितनी ही 
मौजों का सामना किया
एक दूसरे का हाथ थामे,

एक दिन एक बड़ी सी 
मौज तुम्हे सागर के 
दूसरे किनारे तक ले गई 
क्योंकि एक दिन तुम्हे 
महत्वकांक्षा के जहाज पर 
बैठकर इस सागर के 
सीने को कुचलना था,

जानती हूँ उस किनारे से 
इस किनारे तक तैर के आना 
अब तुम्हारे लिए मुमकिन नहीं 
और जहाज़ पर बैठना मेरे लिए,

फिर भी मैं इस इंतज़ार में 
रोज़ इस साहिल पर आती हूँ
कि शायद कोई मौज तुम्हें 
उस किनारे से बहाकर फिर 
इस किनारे तक ले आये,


अक्टूबर 28, 2013

लाज



इस खुबसूरत पेंटिंग को देखकर दिल से निकले कुछ ख्याल :-

नैनो में डाल के कजरा 
केशों में बाँध के गजरा,
बल खा के चली मैं आज
जग से मोहे आती है लाज,

पनघट पे खड़ा होगा बैरी
तोड़ेगा फिर गगरी मोरी,
मरती हैं जिस पर सभी गोरी 
करता है जो माखन की चोरी, 

वेणु पर लिए वो मधुर तान 
होठों पर एक मंद मुस्कान, 
झुक जाएगी पलके लाज से 
छोड़ेगा नैनो से ऐसे बान, 

मेरे इस जीवन का अंग है आधा 
वो मेरा कृष्णा , मैं उसकी राधा 

© इमरान अंसारी

अक्टूबर 21, 2013

वक़्त



उम्र गुज़रती रही ज़िन्दगी कटती रही 
हर मोड़ पर यहाँ कहानी बदलती रही, 
एक ख़ुशी की खातिर मैं तड़पता रहा 
और वक़्त जैसे पँख लगाकर उड़ता रहा,

बचपन की शरारतें बस्तों में सिमट गईं
दोस्तों की वो टोलियाँ सब उचट गईं,
मैं अकेला और अकेला सिमटता रहा    
और वक़्त जैसे पँख लगाकर उड़ता रहा,

जवानी की मदभरी नज़र ने प्यार सिखाया 
एक नाज़नीन ने मुझको भी दिल से लगाया, 
घनी जुल्फों का साया मुझ पर पड़ता रहा 
और वक़्त जैसे पँख लगाकर उड़ता रहा,

मिला प्यार में जुदाई और बेवफाई का सिला   
सब लिया अपने हिस्से नहीं किया कोई गिला, 
एक काँटा सा मगर सदा सीने में गड़ता रहा 
और वक़्त जैसे पँख लगाकर उड़ता रहा,

न जाने कितने लोग आए और चले गए 
हम तो कितनी  बार कैसे-कैसे छले गए 
किताबों की तरह मैं चेहरों को पढ़ता रहा 
और वक़्त जैसे पँख लगाकर उड़ता रहा,

© इमरान अंसारी