रात फिर आयी थी याद तेरी
रोती रही, गिड़गिड़ाती रही
हिचकियों की आवाज़ें
मेरे कानों में गूँजती रही
ज़ेहन की देहरी से लगी तेरी याद
रात भर सिसकती रही,
अरसा गुज़र गया है
उस वक़्त को बीते हुए,
पर आज भी तेरी याद
मेरा पीछा नहीं छोड़ती,
जब भीड़ में होता हूँ,
तो ये तनहा कर देती है,
जब तनहा हूँ तो
गुज़रे लम्हों का एक
मज़मा सा लगा देती है,
और फिर मुझे उसी अतल
गहराई में धकेल देती है
जहाँ अतीत और वर्तमान
के बीच सब धुंधला सा जाता है,
और मैं गुमराह राही सा अनजान
ये सोच ही नहीं पाता कि
कौन सा रास्ता अतीत के
काले अंधेरों में जाकर गुम हो जाता है
और कौन सा वर्तमान के उजियारे में,
तंग आ गया हूँ अब मैं
इसकी पिघला देने वाली
मनुहारों से बचने के लिए,
अपने ज़ेहन कि कोठरी के
दरवाज़े मज़बूती से बंद कर दिए,
रात फिर आयी थी याद तेरी
रोती रही, गिड़गिड़ाती रही
हिचकियों की आवाज़ें
मेरे कानों में गूँजती रही
ज़ेहन की देहरी से लगी तेरी याद
रात भर सिसकती रही,
© इमरान अंसारी




