दिसंबर 17, 2013

दीवानी



छलक न पड़े इनमें से दर्द कहीं इसलिए
आँखों को काजल से सजाकर रखती थी,

मिलते ही चला न जाये दिल का करार 
इसलिए नज़रों को झुकाकर रखती थी, 

पहचान न ले कहीं चेहरे से ये ज़माने वाले  
प्यार को मेरे सीने में दबाकर रखती थी,

नहीं कर पाई होठों से इक़रार इश्क़ का मगर 
तस्वीर मेरी किताबों में छुपाकर रखती थी,

अजीब दीवानी सी लड़की थी वो 'इमरान'
इंतज़ार में तेरे पलकें बिछाकर रखती थी,


दिसंबर 07, 2013

अहसास-ए-तन्हाई



कोहरे से घिरी सर्द रातों में अक्सर 
यूँ भी घर से निकलता हूँ ये सोचकर 
कि मेरी ही तरह चाँद को भी 
अहसास-ए-तन्हाई सताती होगी,

ठिठुरती हुई इन गलियों में 
आवारा चाँदनी भटकती होगी,
गर्म दुशाले में लिपटी वो कहीं 
अलाव से हाथों को सेकती
मेरी याद में तड़पती होगी,

अहसासों की गर्म तपिश के सहारे 
साँसों के गर्म उजले धुएँ की रौशनी में, 
धुंध को चीरता मैं चला जाता हूँ 
एक सिर्फ तेरी ही तलाश में, 

दूर कहीं कुछ साये से लहराते हैं  
दामन का तेरे अहसास कराते है, 
कहीं कोई दीप झिलमिलाता है 
मिलन की एक आस जगाता है,

कहीं कुछ नज़र नहीं आता 
अपने ही क़दमों कि आवाज़ें हैं, 
इस सिरे से उस सिरे तक सिर्फ
सफ़ेद कोहरे कि परवाज़ें हैं,

मेरी ही तरह ये चाँद भी जलता है 
कैसा मेरा और इसका रिश्ता है,
रजाइयों में दुबक जब सोता है जहाँ 
आशिक़ पिया मिलन को तरसता है,

कोहरे से घिरी सर्द रातों में अक्सर 
यूँ भी घर से निकलता हूँ ये सोचकर 
कि मेरी ही तरह चाँद को भी 
अहसास-ए-तन्हाई सताती होगी,

© इमरान अंसारी

नवंबर 30, 2013

याद



रात फिर आयी थी याद तेरी 
रोती रही, गिड़गिड़ाती रही 
हिचकियों की आवाज़ें 
मेरे कानों में गूँजती रही   
ज़ेहन की देहरी से लगी तेरी याद 
रात भर सिसकती रही, 

अरसा गुज़र गया है
उस वक़्त को बीते हुए,
पर आज भी तेरी याद 
मेरा पीछा नहीं छोड़ती,   

जब भीड़ में होता हूँ, 
तो ये तनहा कर देती है, 
जब तनहा हूँ तो 
गुज़रे लम्हों का एक 
मज़मा सा लगा देती है,

और फिर मुझे उसी अतल
गहराई में धकेल देती है 
जहाँ अतीत और वर्तमान
के बीच सब धुंधला सा जाता है,

और मैं गुमराह राही सा अनजान 
ये सोच ही नहीं पाता कि 
कौन सा रास्ता अतीत के 
काले अंधेरों में जाकर गुम हो जाता है
और कौन सा वर्तमान के उजियारे में,  

तंग आ गया हूँ अब मैं  
इसकी पिघला देने वाली 
मनुहारों से बचने के लिए, 
अपने ज़ेहन कि कोठरी के 
दरवाज़े मज़बूती से बंद कर दिए,

रात फिर आयी थी याद तेरी 
रोती रही, गिड़गिड़ाती रही 
हिचकियों की आवाज़ें 
मेरे कानों में गूँजती रही   
ज़ेहन की देहरी से लगी तेरी याद 
रात भर सिसकती रही, 

© इमरान अंसारी


नवंबर 26, 2013

कागज़ की नाव



अरमानों को मोड़कर
हसरतो को जोड़कर,
एक कश्ती बनाई थी मैंने
और ये सोच कर पानी में बहा दी
कि एक रोज़ इसे साहिल मिलेगा,
मेरे दिल के किनारे से छूटी ये
कभी तो तेरे दिल के किनारे लगेगी,

वक़्त के तूफान को पर ये मंज़ूर न था 
हालातों के एक ही भंवर ने
आँसूओं का वो सैलाब पैदा किया
जिसमें गर्क हो गई कश्ती मेरी,

मजबूत कश्ती समझा था मैं जिसे 
वो तो फ़क़त कागज़ की नाव थी,
और कागज़ों की नावों के मुक़द्दर में
साहिल नहीं हुआ करते हैं,
उनके नसीब में तो मझधार में
डूब जाना ही लिखा होता है,

© इमरान अंसारी

नवंबर 19, 2013

साहिल



आज भी जा बैठती हूँ 
सागर के उसी साहिल पर 
जहाँ बैठे घंटो हम दूर 
अस्त होते सूरज को 
निहारा करते थे, 

इन लहरों पर कितनी ही 
प्यार भरी अठखेलियाँ 
किया करते थे हम दोनों,

इसी सागर पर किश्ती 
पर बैठे हमने कितनी ही 
मौजों का सामना किया
एक दूसरे का हाथ थामे,

एक दिन एक बड़ी सी 
मौज तुम्हे सागर के 
दूसरे किनारे तक ले गई 
क्योंकि एक दिन तुम्हे 
महत्वकांक्षा के जहाज पर 
बैठकर इस सागर के 
सीने को कुचलना था,

जानती हूँ उस किनारे से 
इस किनारे तक तैर के आना 
अब तुम्हारे लिए मुमकिन नहीं 
और जहाज़ पर बैठना मेरे लिए,

फिर भी मैं इस इंतज़ार में 
रोज़ इस साहिल पर आती हूँ
कि शायद कोई मौज तुम्हें 
उस किनारे से बहाकर फिर 
इस किनारे तक ले आये,