कोहरे से घिरी सर्द रातों में अक्सर
यूँ भी घर से निकलता हूँ ये सोचकर
कि मेरी ही तरह चाँद को भी
अहसास-ए-तन्हाई सताती होगी,
ठिठुरती हुई इन गलियों में
आवारा चाँदनी भटकती होगी,
गर्म दुशाले में लिपटी वो कहीं
अलाव से हाथों को सेकती
मेरी याद में तड़पती होगी,
अहसासों की गर्म तपिश के सहारे
साँसों के गर्म उजले धुएँ की रौशनी में,
धुंध को चीरता मैं चला जाता हूँ
एक सिर्फ तेरी ही तलाश में,
दूर कहीं कुछ साये से लहराते हैं
दामन का तेरे अहसास कराते है,
कहीं कोई दीप झिलमिलाता है
मिलन की एक आस जगाता है,
कहीं कुछ नज़र नहीं आता
अपने ही क़दमों कि आवाज़ें हैं,
इस सिरे से उस सिरे तक सिर्फ
सफ़ेद कोहरे कि परवाज़ें हैं,
मेरी ही तरह ये चाँद भी जलता है
कैसा मेरा और इसका रिश्ता है,
रजाइयों में दुबक जब सोता है जहाँ
आशिक़ पिया मिलन को तरसता है,
कोहरे से घिरी सर्द रातों में अक्सर
यूँ भी घर से निकलता हूँ ये सोचकर
कि मेरी ही तरह चाँद को भी
अहसास-ए-तन्हाई सताती होगी,
© इमरान अंसारी