दिसंबर 30, 2013

स्माइल प्लीज़


दोस्तों आज पहली बार ज़रा 'हास्य' में कुछ लिखा है । आपके सामने पेश है.... । अच्छा- बुरा जैसा भी लगे ज़रूर बताएं।  कसौटी होगी आपकी मुस्कान अगर वो चेहरे तक आ गयी है न छुपाये और हमे भी दाँत दिखाएँ ताकि हम उन्हें गिन पाएँ ...तो न झुंझलाये और लुत्फ़ उठायें :-
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घर से हम थे जैसे ही निकले 
थोड़ी ही दूर पर जाकर फिसले,

देखा एक गोरा सा मुखड़ा 
हाय ! चाँद का था टुकड़ा,

दिल आया उसके क़दमों के नीचे
फ़ौरन ही हम लग लिए थे पीछे, 

सुर्ख होठ थे गालों पर थी लाली 
पता चला थानेदार की थी साली,

लम्बे घने रेशम के जैसे थे बाल 
किसी नागिन सी उसकी थी चाल, 

खड़ा था वहाँ उसका भाई भी निट्ठल्ला 
आ गए हम जहाँ वो था उसका मोहल्ला,

हट्टा-कट्टा मुस्टंडा सा था जवान 
दंड पेलने वाला था वो पहलवान, 

देखते ही कम्बख्त वो ऐसा टूट पड़ा 
जिस्म के हर हिस्से से दर्द फूट पड़ा,

काँटे से इश्क़ कि राह में बो दिए गए 
हाय ! हम बुरी तरह से धो दिए गए,   

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ये मुस्कराहट यूँ ही बनी रहे आने वाला नया साल आप सभी के जीवन में खुशियों की बहार लेकर आये । नव वर्ष कि हार्दिक शुभकामनायें आप सभी को |



दिसंबर 23, 2013

शक्ति



आँखों में कितने ख्वाब मचलते थे 
हसरतों के दिल में चिराग जलते थे,

झक सफ़ेद एक घोड़े पर सवार 
ख्वाबो का वो सब्ज़ शहज़ादा 
एक रोज़ कहीं दूर से आएगा 
अपने साथ मुझे भी ले जायेगा,

हाय ! कितनी नादाँ थी कितनी भोली मैं 
कच्ची उम्र में बिठा दी गयी डोली में मैं,
बैठी शर्म से सकुचाई फूलों की सेज पर
आते ही रखी थी उसने बोतल मेज पर,

लड़खड़ा रहे थे कदम मुँह से छूटता भभूका था 
खसोटा ज़ालिम ने जैसे भेड़िया कोई भूखा था,
अब तो यही स्वर्ग और यही देवता था मेरा 
यही संस्कृति थी और यही अब धर्म था मेरा,

रीती-रिवाज़ों के बंधन में जकड़ी गई 
कैसे-कैसे और कहाँ-कहाँ मैं पकड़ी गई,
जिसके लिए रखती रही करवा-चौथ
उसने सीने पर बिठा दी लाकर सौत,

मासूम बच्चों की आँखों को देखती रही 
इनका क्या दोष है बस ये सोचती रही, 
हर ज़ुल्म इसलिए चुपचाप सहती रही
दरिया में तिनके कि तरह मैं बहती रही,

पूछती रब से तूने तो जग को बनाया 
इस जग ने तो जननी को ही भुलाया,
सुन कर बात मेरी वो धीरे से मुस्काया 
बोला तूने भी तो अपनी शक्ति को भुलाया,

मत भूल तुझे भी मैंने वो सब दिया है
जिस पर इतराता ये पुरुष जिया है,
देख उठा कर शास्त्रो और पुराणो को 
मारा है शक्ति ने कितने हैवानों को,

भस्म हुए है जिस पर तूने नज़र डाली है 
सिर्फ कोमलांगी नहीं तुझमे भी काली है,
झुक जाती सबके आगे तुझमे वो भक्ति है
और दुष्टों का संहार करे तुझमे वो शक्ति है,  
     
© इमरान अंसारी    

दिसंबर 17, 2013

दीवानी



छलक न पड़े इनमें से दर्द कहीं इसलिए
आँखों को काजल से सजाकर रखती थी,

मिलते ही चला न जाये दिल का करार 
इसलिए नज़रों को झुकाकर रखती थी, 

पहचान न ले कहीं चेहरे से ये ज़माने वाले  
प्यार को मेरे सीने में दबाकर रखती थी,

नहीं कर पाई होठों से इक़रार इश्क़ का मगर 
तस्वीर मेरी किताबों में छुपाकर रखती थी,

अजीब दीवानी सी लड़की थी वो 'इमरान'
इंतज़ार में तेरे पलकें बिछाकर रखती थी,


दिसंबर 07, 2013

अहसास-ए-तन्हाई



कोहरे से घिरी सर्द रातों में अक्सर 
यूँ भी घर से निकलता हूँ ये सोचकर 
कि मेरी ही तरह चाँद को भी 
अहसास-ए-तन्हाई सताती होगी,

ठिठुरती हुई इन गलियों में 
आवारा चाँदनी भटकती होगी,
गर्म दुशाले में लिपटी वो कहीं 
अलाव से हाथों को सेकती
मेरी याद में तड़पती होगी,

अहसासों की गर्म तपिश के सहारे 
साँसों के गर्म उजले धुएँ की रौशनी में, 
धुंध को चीरता मैं चला जाता हूँ 
एक सिर्फ तेरी ही तलाश में, 

दूर कहीं कुछ साये से लहराते हैं  
दामन का तेरे अहसास कराते है, 
कहीं कोई दीप झिलमिलाता है 
मिलन की एक आस जगाता है,

कहीं कुछ नज़र नहीं आता 
अपने ही क़दमों कि आवाज़ें हैं, 
इस सिरे से उस सिरे तक सिर्फ
सफ़ेद कोहरे कि परवाज़ें हैं,

मेरी ही तरह ये चाँद भी जलता है 
कैसा मेरा और इसका रिश्ता है,
रजाइयों में दुबक जब सोता है जहाँ 
आशिक़ पिया मिलन को तरसता है,

कोहरे से घिरी सर्द रातों में अक्सर 
यूँ भी घर से निकलता हूँ ये सोचकर 
कि मेरी ही तरह चाँद को भी 
अहसास-ए-तन्हाई सताती होगी,

© इमरान अंसारी

नवंबर 30, 2013

याद



रात फिर आयी थी याद तेरी 
रोती रही, गिड़गिड़ाती रही 
हिचकियों की आवाज़ें 
मेरे कानों में गूँजती रही   
ज़ेहन की देहरी से लगी तेरी याद 
रात भर सिसकती रही, 

अरसा गुज़र गया है
उस वक़्त को बीते हुए,
पर आज भी तेरी याद 
मेरा पीछा नहीं छोड़ती,   

जब भीड़ में होता हूँ, 
तो ये तनहा कर देती है, 
जब तनहा हूँ तो 
गुज़रे लम्हों का एक 
मज़मा सा लगा देती है,

और फिर मुझे उसी अतल
गहराई में धकेल देती है 
जहाँ अतीत और वर्तमान
के बीच सब धुंधला सा जाता है,

और मैं गुमराह राही सा अनजान 
ये सोच ही नहीं पाता कि 
कौन सा रास्ता अतीत के 
काले अंधेरों में जाकर गुम हो जाता है
और कौन सा वर्तमान के उजियारे में,  

तंग आ गया हूँ अब मैं  
इसकी पिघला देने वाली 
मनुहारों से बचने के लिए, 
अपने ज़ेहन कि कोठरी के 
दरवाज़े मज़बूती से बंद कर दिए,

रात फिर आयी थी याद तेरी 
रोती रही, गिड़गिड़ाती रही 
हिचकियों की आवाज़ें 
मेरे कानों में गूँजती रही   
ज़ेहन की देहरी से लगी तेरी याद 
रात भर सिसकती रही, 

© इमरान अंसारी


नवंबर 26, 2013

कागज़ की नाव



अरमानों को मोड़कर
हसरतो को जोड़कर,
एक कश्ती बनाई थी मैंने
और ये सोच कर पानी में बहा दी
कि एक रोज़ इसे साहिल मिलेगा,
मेरे दिल के किनारे से छूटी ये
कभी तो तेरे दिल के किनारे लगेगी,

वक़्त के तूफान को पर ये मंज़ूर न था 
हालातों के एक ही भंवर ने
आँसूओं का वो सैलाब पैदा किया
जिसमें गर्क हो गई कश्ती मेरी,

मजबूत कश्ती समझा था मैं जिसे 
वो तो फ़क़त कागज़ की नाव थी,
और कागज़ों की नावों के मुक़द्दर में
साहिल नहीं हुआ करते हैं,
उनके नसीब में तो मझधार में
डूब जाना ही लिखा होता है,

© इमरान अंसारी

नवंबर 19, 2013

साहिल



आज भी जा बैठती हूँ 
सागर के उसी साहिल पर 
जहाँ बैठे घंटो हम दूर 
अस्त होते सूरज को 
निहारा करते थे, 

इन लहरों पर कितनी ही 
प्यार भरी अठखेलियाँ 
किया करते थे हम दोनों,

इसी सागर पर किश्ती 
पर बैठे हमने कितनी ही 
मौजों का सामना किया
एक दूसरे का हाथ थामे,

एक दिन एक बड़ी सी 
मौज तुम्हे सागर के 
दूसरे किनारे तक ले गई 
क्योंकि एक दिन तुम्हे 
महत्वकांक्षा के जहाज पर 
बैठकर इस सागर के 
सीने को कुचलना था,

जानती हूँ उस किनारे से 
इस किनारे तक तैर के आना 
अब तुम्हारे लिए मुमकिन नहीं 
और जहाज़ पर बैठना मेरे लिए,

फिर भी मैं इस इंतज़ार में 
रोज़ इस साहिल पर आती हूँ
कि शायद कोई मौज तुम्हें 
उस किनारे से बहाकर फिर 
इस किनारे तक ले आये,


अक्टूबर 28, 2013

लाज



इस खुबसूरत पेंटिंग को देखकर दिल से निकले कुछ ख्याल :-

नैनो में डाल के कजरा 
केशों में बाँध के गजरा,
बल खा के चली मैं आज
जग से मोहे आती है लाज,

पनघट पे खड़ा होगा बैरी
तोड़ेगा फिर गगरी मोरी,
मरती हैं जिस पर सभी गोरी 
करता है जो माखन की चोरी, 

वेणु पर लिए वो मधुर तान 
होठों पर एक मंद मुस्कान, 
झुक जाएगी पलके लाज से 
छोड़ेगा नैनो से ऐसे बान, 

मेरे इस जीवन का अंग है आधा 
वो मेरा कृष्णा , मैं उसकी राधा 

© इमरान अंसारी

अक्टूबर 21, 2013

वक़्त



उम्र गुज़रती रही ज़िन्दगी कटती रही 
हर मोड़ पर यहाँ कहानी बदलती रही, 
एक ख़ुशी की खातिर मैं तड़पता रहा 
और वक़्त जैसे पँख लगाकर उड़ता रहा,

बचपन की शरारतें बस्तों में सिमट गईं
दोस्तों की वो टोलियाँ सब उचट गईं,
मैं अकेला और अकेला सिमटता रहा    
और वक़्त जैसे पँख लगाकर उड़ता रहा,

जवानी की मदभरी नज़र ने प्यार सिखाया 
एक नाज़नीन ने मुझको भी दिल से लगाया, 
घनी जुल्फों का साया मुझ पर पड़ता रहा 
और वक़्त जैसे पँख लगाकर उड़ता रहा,

मिला प्यार में जुदाई और बेवफाई का सिला   
सब लिया अपने हिस्से नहीं किया कोई गिला, 
एक काँटा सा मगर सदा सीने में गड़ता रहा 
और वक़्त जैसे पँख लगाकर उड़ता रहा,

न जाने कितने लोग आए और चले गए 
हम तो कितनी  बार कैसे-कैसे छले गए 
किताबों की तरह मैं चेहरों को पढ़ता रहा 
और वक़्त जैसे पँख लगाकर उड़ता रहा,

© इमरान अंसारी

अक्टूबर 08, 2013

दीया



आस का एक दीया
जलता है मुझमें 
विश्वास का एक दीया
जलता है मुझमें,

बारिशो ने जोर लगाया 
आधियों ने फूँक मारी 
पर इस दिए की लौ 
किसी से भी न हारी, 

लाख कोशिशें की मिलकर 
बेदर्द ज़माने वालों ने 
हर तरकीब अपनाई 
मुझको बुझाने वालों ने,

इस दीये की लौ नहीं काँपती
क्योंकि ये तुझसे लगाई है 
जब-जब भी हवा चली है 
ये और मुस्कुराई है,

आस का एक दीया
जलता है मुझमें 
विश्वास का एक दीया
जलता है मुझमें,

सितंबर 23, 2013

आँखें

एक ऐसे शख्स के लिए जिसकी आँखे कुछ कहने के लिए बेक़रार कर जाती है। ……मेरी तरफ से ये प्यार भरा तोहफा खूबसूरत आँखों की उस मल्लिका  के लिए -


लूट के ले जाती हैं दिल का चैन-ओ- करार 
जब भी शरमा के झुकती हैं तेरी आँखें,

दोनों के दिल में अरमानों का सैलाब उठता है 
जब भी मेरी आँखों से मिलती हैं तेरी आँखें,

अपने वजूद में तेरा अक्स दिखने लगता है 
जब मेरे चेहरे को तकती हैं तेरी आँखें, 

इस सूनी जिंदगी में प्यार की फुहार लाती हैं 
सहरा में बादल की तरह बरसती हैं तेरी आँखें, 

आ ! तुझे बाहों में लेकर चूम लूँ इनको 
इक उम्र से प्यार को तरसती हैं तेरी आँखें 

शराबी की तरह पीकर बहक जाता है 'इमरान'
किसी पैमाने की तरह छलकती हैं तेरी आँखें,


सितंबर 16, 2013

इंतज़ार


ज़ख्म रिसने लगते हैं
दर्द बहने लगता है 
आँखे अश्कों में 
भीग जाती हैं आज भी,
जब-जब उस शब 
का ज़िक्र आता है 
जो तेरे इंतज़ार में गुजरी थी....... 

शब भर हौले-हौले चाँद 
फलक पर सरकता रहा 
सितारे थके हुए मुसाफिरों 
की तरह आसमान पर पड़े रहे,

दूर कहीं हवा से कोई 
पत्ता खड़कता था 
तो दिल की धड़कने 
कहती थी तुम ही हो,

दरिया के बहते हुए 
पानी की आवाज़ पर 
तुम्हारे पाज़ेब की झंकार
का गुमां होने लगता,

बहकी-बहकी सी हवा
कुछ यूँ छू के गुज़र रही थी 
जैसे तुम आकर मेरे बालों में 
उँगलियाँ फेर रही हो,

इन्हीं ख्यालों में कहीं गुम 
मैं तमाम शब तेरे आने 
का इंतज़ार करता रहा,
तेरे आने के गुमाँ होते रहे पर 
तूने आने की ज़हमत न उठाई,
नहीं जानता किसने तेरे पैर बाँधे 
वो तेरी मजबूरी थी या मरज़ी, 

चाँद भी आखिर अपनी मंजिल 
पर पहुँच ही गया और 
मुसाफिर सितारे भी एक-एक 
करके अपनी राह चलते बने,

और मैं उस शब को बाँध 
गठरी कंधे पर लादकर 
छोड़ आया था शहर तेरा 
आज भी जब कभी उस 
गठरी को खोलता हूँ तो..... 

ज़ख्म रिसने लगते हैं
दर्द बहने लगता है 
आँखे अश्कों में 
भीग जाती हैं आज भी,
जब-जब उस शब 
का ज़िक्र आता है 
जो तेरे इंतज़ार में गुजरी थी....... 


सितंबर 09, 2013

बचपन



जिंदगी का वो हसीं दौर लौटा दे 
ए ! वक़्त मुझे मेरा बचपन लौटा दे……

जब माँ के आँचल में छुप जाता था
जब न किसी गम से मेरा नाता था,

जिंदगी का वो हसीं दौर लौटा दे 
ए ! वक़्त मुझे मेरा बचपन लौटा दे……

जब आगे निकल जाने की होड़ न थी 
जब दुनिया की ये पागल दौड़ न थी,

जिंदगी का वो हसीं दौर लौटा दे 
ए ! वक़्त मुझे मेरा बचपन लौटा दे……

जब पल में रूठना और पल में मनाना था 
जब दोस्ती का खुबसूरत वो ज़माना था, 

जिंदगी का वो हसीं दौर लौटा दे 
ए ! वक़्त मुझे मेरा बचपन लौटा दे………

जब मोहल्ले से आती शिकायतें थी 
जब हुआ करती मासूम शरारतें थी, 

जिंदगी का वो हसीं दौर लौटा दे 
ए ! वक़्त मुझे मेरा बचपन लौटा दे……

जब तोड़ते पेड़ों से बेर, अमरुद और आम थे 
जब रखते एक दूसरे के कैसे-कैसे नाम थे, 

जिंदगी का वो हसीं दौर लौटा दे 
ए ! वक़्त मुझे मेरा बचपन लौटा दे……

जब धूप, बारिश, आँधी सब झेला करते थे 
जब सुबह से शाम तक बस खेला करते थे, 

जिंदगी का वो हसीं दौर लौटा दे 
ए ! वक़्त मुझे मेरा बचपन लौटा दे……

अगस्त 31, 2013

तामीर


अपनी हसरतों के गारे से 
उम्मीदों की ईंटों की चुनाई कर 
यकीन की बुनियाद पर 'रिश्तों'
की ईमारत तामीर की थी मैंने,  

इश्क के छप्पर तले  
कई सुनहले दिन और 
कई खवाबों भरी रातें
कितने सुकूँ से बीती थी,

पर एक रात जब खुद को 
दुनिया के गम से महफूज़ समझ 
मैं गफलत की नींद सो रहा था 
तभी वक़्त का ज़लज़ला उठा 

जिसने यकीन की बुनियाद को 
जड़ से हिला कर रख दिया  
पल भर में ईमारत धूल में मिल गई 
और मैं मलबे के नीचे कहीं दब गया,

बामुश्किल बाहर आ सका, मेरे आलावा 
मेरा कुछ भी बाकी न बचा,
भीड़ अपनी-अपनी इमारतें बचाने में लगी रही 
शिकायतों और सलाहों से भरी आवाजें गूँजती  
वजह बुनियाद का कमज़ोर होना था 
या फिर कच्चे गारे की वो चुनाई 
जो एक ही बारिश में दरक गई थी,

समझाया लोगों ने कि यूँ मायूस न हो 
फिर से कोशिश करो और एक 
नई बुनियाद पर नयी ईमारत तामीर होगी,        

और मैं अपने ज़ख्मों को कुरेदता
दिल में ये सोचता रहा कि हम 
इन्हें बनाते रहेंगे और वक़्त गिराता रहेगा 
यहाँ बनी सभी कच्ची-पक्की इमारतें 
एक न एक दिन धूल में मिल जानी हैं,

तब से ये आसमान ही मेरे सर की छत है 
और ये ज़मीं मुझे अपने आगोश में लेकर 
दुनिया के हर फ़िक्र-ओ-गम से महफूज़ रखती है,
जब खोने को कुछ बाकी न बचा 
तब मुझे वो मिला जो कभी नहीं खोता…….

पिंजड़ों में परवाज़ें नहीं हुआ करती 
उसके लिए पंखों का खुलना ज़रूरी है,

अगस्त 17, 2013

पूरे चाँद की अधूरी रात



वो पूरे चाँद की एक अधूरी सी रात,
जो जिंदगी में ठहर सी गई है,  

वो दरिया का किनारा 
पूरे चाँद की नीली सी रौशनी 
जो दरिया के पानी पर हिचकोले लेती 
दूर तक तैरती चली जाती थी,

उसके साथ-साथ वक़्त 
और हम भी बहते रहे, 
इस एक आखिरी मुलाक़ात में 
एक लम्बी ख़ामोशी के दरमियाँ 
तुम्हारे होंठ कुछ कहने के लिए 
कई बार काँपते रह गए,

और मैं जान के भी अनजान 
गुमसुम सा पानी के उठते 
बुलबुलों को एकटक देखता 
दिल में उनकी लम्बी जिंदगी 
की दुआ माँगता रहा…….

हमारा प्यार भी तो ऐसा ही था,
वक़्त का तेज़ बहाव आज इसे 
अपने साथ बहा ले जाएगा,
लरज़ते हाथो से तुमने अपना 
हाथ मेरे हाथ में लेकर 
हमेशा के लिए विदा माँगी थी,

उस रोज़ तुमने कहा था 
हम इस दरिया के दोनों 
किनारे जैसे ही हैं जो...... 
एक दूसरे के बिना मुक़म्मल नहीं 
एक दूसरे से जुदा भी नहीं,
पर जिनका कभी मिलन नहीं होता, 
  
वो पूरे चाँद की एक अधूरी सी रात,
जो जिंदगी में ठहर सी गई है,  

       

अगस्त 05, 2013

करम


बहुत सख्त हो कर भी टूट जाता है दरख़्त 
बचता है वही जो अन्दर से कुछ नरम हो, 

कोई किसी का दुश्मन न रहे जहाँ में  
काश के दुनिया में एक ऐसा धरम हो, 

मिलेगी तुझे भी पाक सुराही से शराब 
शर्त है ये मगर की प्यास तेरी चरम हो,

बच जाता है वो शख्स गुनाहों से अक्सर 
बाकी जिसके अन्दर थोड़ी सी शरम हो,

अपनी तलाश निकालती है गौतम*को बाहर 
दुनिया की ऐश से भरा चाहें उसका हरम हो, 

सवालिया निशान लगते हैं तेरे वजूद पर भी 
दिखा अपना जलवा दूर दुनिया का भरम हो, 

मंजिल खुद तुम्हें ढूँढ लेगी एक रोज़  'इमरान' 
तेरे मौला का बस एक तुझ पर जो करम हो, 

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*गौतम* - यहाँ आशय गौतम बुद्ध से है । 

जुलाई 25, 2013

एकालाप

प्रिय ब्लॉगर साथियों,

आज पहली बार हिंदी में कविता लिखने का प्रयास किया है......आपके समक्ष  ये कविता आलोचना के लिए भी प्रस्तुत है आप पाठकों से (अनीता जी, अमृता जी और निहार रंजन से खास) अनुरोध है कि जो भी कमी-बेशी नज़र आए उसे निसंकोच कहें........ ये मुझे आगे अधिक अच्छा लिखने की प्रेरणा देगा.........

एक बात और है मेरे ब्लॉग के पुराने मित्र / पाठकों को मैं ये बताना चाहता हूँ कि अब इस ब्लॉग पर सिर्फ मेरी अपनी लिखी हुई रचनाएँ ही पोस्ट होती हैं जो पिछले काफी अरसे से नियमित हैं पुरानी पोस्टें जो मेरे द्वारा लिखित नहीं थी और ब्लॉग पर प्रकाशित की गईं थी वो सारी मैंने इस ब्लॉग से अब हटा दी हैं और आगे भी अच्छा या बुरा जैसा भी है जज़्बात पर सिर्फ मेरा अपना लिखा हुआ ही मिलेगा........बात इमानदारी की थी और है इसलिए आज ये सूचना आप सबको दी ......उम्मीद है कि आप लोग हमेशा कि तरह हौसला-अफज़ाई करते रहेंगे । तो पेश है ये हिंदी कविता..............
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रात्रि की ये निस्तब्ध नीरवता 
नभ में फैली चन्द्र की शीतलता,

सरिता का प्रवाह भी कैसा मंद है 
परन्तु हृदय की कली अभी बंद है,

विचारों से दूषित अभी ये मन है  
पतझड़ में घिरा अभी उपवन है,

अभी काम, क्रोध, घृणा और द्वेष है
धरता ये मन तरह-तरह के भेष है,

मित्रता, स्नेह और प्रेम के बंधन हैं 
बढ़ते पाँवों की ये भी एक जकड़न हैं, 

दूरगामी पथ पर चलता एक पथिक 
जीवन क्या है और इससे अधिक,

विस्तृत होता हर दिशा में विरोधाभास 
कैसे अनुभूत करूँ मैं भीतर की सुवास, 

क्षीण ही सही पर होता है ये आभास 
पूर्ण होगा स्वयं को पाने का प्रयास, 

क्या ये एक विक्षिप्त का प्रलाप है
अथवा ये केवल मेरा एकालाप है,


जुलाई 16, 2013

आज

मैं डरा-डरा सहमा सा 
शाम के धुंधलके में......... 

जैसे ही अपने 'आज' को 
पोटली में समेटकर 
चार कोस आगे आने वाले
'कल' की ओर लेकर चलता हूँ,
कि तभी अतीत के अँधेरे से 
निकलने वाले काले साए  
मुझे चारों तरफ से घेर लेते हैं,
और मुझ पर जानलेवा हमला करके 
मेरी पोटली से वो मेरा 'आज' चुराकर
फिर से अतीत के अंधेरों में ग़ुम हो जाते हैं, 

हर रोज़ ही ये कहानी 
खुद को दोहराती है.......
बड़ी मशक्कत से मैं रोज़ 
एक नया 'आज' कमाता हूँ 
और रोज़ ही अतीत के वो काले साए 
मुझसे मेरा आज छीन के ले जाते हैं,
और मैं रोज़ मिलने वाले ज़ख्मों 
को भर कर फिर से निकलता हूँ
जिंदगी कि सख्त राहों पर,

इस उम्मीद में कि कभी न कभी मैं 
अतीत के सायों से अपने 'आज' को 
महफूज़ बचाकर चार कोस पर 
आने वाले 'कल' तक ले जाउँगा
क्योंकि कहते हैं वहाँ जो सूरज 
एक बार निकलता है 
वो फिर कभी नहीं डूबता  
उस के उजाले में अतीत के 
काले सायों से सदा के लिए 
छुटकारा मिल जाता है,  

मैं डरा-डरा सहमा सा 
शाम के धुंधलके में..............

जुलाई 06, 2013

बारिश


आज फिर आई थी बारिश 
हर बार की तरह..........

मेरी खिड़की के दरवाज़ों पर,
बहुत देर तक खटखटाती रही
अन्दर तक आ जाने के लिए,

और मैं, किसी ख्याल में ग़ुम 
अपने ज़ेहन की कोठरी में 
किसी याद से बंधा पड़ा था,

जब तक मैं खिड़की पर आया
तो काफी देर इंतज़ार करके 
वो मायूस होकर लौट गई थी ,

जाते-जाते खिड़की के काँच पर 
मेरे लिए अँगुली से लिखा  
एक संदेसा छोड़ गई थी,

इन सीलन भरी कोठरियों में
तुम्हारा दम घुट जाता होगा,
मेरी बौछारें तुम्हें जिंदा रखेंगी,

कब तक मुझसे बचते रहोगे
फिर आऊँगी अगले बरस,
तुम्हें अन्दर तक भिगोने को,

कहती थी पगली कि तुम्हें
उस 'जहाँ' कि सैर कराऊँगी 
जहाँ सिर्फ बारिश ही नहीं बल्कि 
अल्लाह कि नेमतें बरसती हैं,   

आज फिर आई थी बारिश 
हर बार की तरह..........

जून 25, 2013

रंगीन तितली

दोस्तों,

अभी कुछ ही दिन पहले मैं एक ऐसे लड़के को जानता था जिसने आत्महत्या कर ली........उसी वाकये को मैंने यहाँ शब्दों में ढालने की कोशिश की है......ये पोस्ट एक सत्य घटना से प्रेरित है और बहुत गहरे सवाल छोड़ती है.......कि आखिर क्यों ऐसा होता है ? लोग किसी के दिल से क्यों खेलते हैं ?........फिर क्या 'आत्महत्या' कोई सही उपाय है ?......मेरी नज़र में हरगिज़ नहीं.....जीवन ईश्वर का दिया एक अनमोल उपहार है उसे ख़त्म करने का उसके सिवा किसी को अधिकार नहीं......युवाओं को ये सन्देश है कि वो जीवन के महत्व को समझे.....माना प्यार बहुत कुछ है पर सब कुछ नहीं ।उम्मीद है आप लोगों को पसंद आये......अपनी निष्पक्ष राय रखे । 
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सुना, कल रात उसने आत्महत्या कर ली.........

सत्रह बरस की कच्ची उम्र में घर छोड़ा था उसने
'बड़ा आदमी' बनने के लिए वो गाँव से
'बड़े शहर' में पढ़ने को चला था
अपने सब सपने साकार करने को चला था,

नया माहौल, नए दोस्त सभी कुछ मिला
भूल गया धीरे-धीरे पीछे का सिलसिला, 
देखते ही देखते 'बड़े शहर' का रंग चढ़ा
जेब में पिता के भेजे पैसे, हाथ में सिगरेट 
पढ़ाई तो जैसे कहीं बहुत पीछे छूट गई, 

उसे 'बड़े शहर' की एक रंगीन तितली मिली 
जो उस के इर्द गिर्द मंडराती पाई जाने लगी,
तितली धीरे-धीरे फूल का रस चूसने लगी,

वो गाँव का नादाँ छोकरा इस आँख-मिचोली 
को दिल से लगा तितली से प्यार करने लगा,
पर तितली कब किसी फूल पर सदा रही है,

जब फूल का रस पीकर उसका दिल भर गया
तो वो फुर्र से दूसरे फूल की और उड़ चली,
तितली जाते-जाते बहुत गहरी गंध छोड़ गई 
दूसरा फूल मिलते ही उसे बिलकुल भूल गई 
सब कुछ खोकर ये फूल मुरझा सा गया, 

बड़े शहरों की जिंदगी का अकेलापन,
धोखा , छल, फरेब इससे अंजान था वो,
इस सब को सहने की ताब न ला सका
अकेलेपन ने इस दर्द को और बढ़ा दिया, 
किसी नाज़ुक से पल में वो बहक गया 
आख़िर उसने वही कदम उठा लिया 
'बड़े शहर' ने एक मासूम लड़के को 
फिर से निगल लिया............

सुना, कल रात उसने आत्महत्या कर ली.........

जून 17, 2013

तू ही तो है माँ....

प्रिय साथियों,

कुछ दिनों की निजी मसरूफियत के चलते नेट-जगत से दूरी सी बनती जा रही है इसके लिए आप सबसे माफ़ी का तलबगार हूँ........उम्मीद है आप सब अल्लाह के फज़ल से अच्छे होंगे और दुआ है कि आगे भी अच्छे रहे।

आज मेरी तरफ से ये ग़ज़ल दुनिया कि तमाम "माँ" के नाम.....वो माँ जो हमे सब कुछ देती है बिना कुछ माँगे जिसका क़र्ज़ कभी नहीं उतारा जा सकता......पाक किताब कहती है उसके क़दमों के नीचे ही जन्नत है उसकी जितनी भी सेवा कि जा सके कम है..............इस उम्मीद में कि आप सबको पसंद आये......पेशे खिदमत है "तू ही तो है माँ"


जब मैं रोता था रातों को अक्सर उठकर 
तब मुझे बहलाने वाली तू ही तो है माँ,

मचल-मचल उठता था जब मैं किसी चीज़ को 
मेरी हर जिद पूरी करने वाली तू ही तो है माँ,

कहाँ था ज्ञान किसी भी बात का मुझको यहाँ 
मुझे दुनिया को दिखाने वाली तू ही तो है माँ,

चलते-चलते ही गिर जाया करता था जब मैं 
तब भी मुझे सँभालने वाली तू ही तो है माँ,

नहीं आने देती है मुझ तक दर्द की धूप को 
अपने आँचल में छुपाने वाली तू ही तो है माँ,

भर आता दिल जब भी दुनिया के दर्द से 
मेरे अश्कों को पोछने वाली तू ही तो है माँ,

इस ज़ालिम ज़माने में नहीं यकीं किसी पर 
मेरे लिए तो मेरा भरोसा बस तू ही तो है माँ,

घिर जाता हूँ जब मैं नाकामी के गहरे कुएँ में 
तब मुझे रौशनी दिखाने वाली तू ही तो है माँ,

नहीं जाता हूँ मैं उसे को ढूँढने किसी तीर्थ में 
मेरे लिए तो मेरी जन्नत बस तू ही तो है माँ,

नहीं चुका पायेगा क़र्ज़ तेरा कभी ये 'इमरान'
इसे जिंदगी बख्शने वाली बस तू ही तो है माँ,

जून 07, 2013

आवाजें

जिंदा रहना है यहाँ अगर 
तो चुप ही रहना सीखो........

कोई नहीं सुनता है 
गरीबों की सदा यहाँ 
यहाँ सुनी जाती है सिर्फ
सिक्को की आवाजें,  

रह जाती हैं अपनी जगह
खड़ी हुई ईमानदारी 
आगे बढ़ जाती हैं यहाँ 
खुशामद से भरी आवाजें, 

नाले में मिलती लाशें
गले के साथ ही साथ 
काट दी जाती हैं यहाँ 
बगावत से भरी आवाजें,

गला फाड़-फाड़ कर 
चिल्लाता है यहाँ झूठ 
और दबा दी जाती हैं 
सच से भरी आवाजें, 

कानून हो मुल्क का या 
फिर भरी हुई अदालत 
फरियादों को रौंद देती हैं
यहाँ रौब से भरी आवाजें,

जिंदा रहना है यहाँ अगर 
तो चुप ही रहना सीखो........

मई 28, 2013

दरख़्त की छाँव


किसी दरख़्त की छाँव तुम्हें रोक लेगी कुछ देर को 
धूप के सफ़र में मगर कदम तुम्हे बढ़ाना ही पड़ेगा,

कब तक भागते फिरोगे आखिर उस ख़ुदा से तुम 
एक रोज़ सजदे में सर तुमको झुकाना ही पड़ेगा,

कभी ऐसे भी दिन दिखलायेगा तुम्हें ये ज़माना 
आग लगी होगी दिल में और मुस्कुराना ही पड़ेगा,

कौन रख पाया है इस जग में एक साथ सबको राज़ी  
यहाँ एक की ख़ुशी के लिए दूसरे को रुलाना ही पड़ेगा,

नहीं चलता है यहाँ साथ कोई भी उमर भर 'इमरान'  
ये जिंदगी का बोझ है इसे तो तुम्हें उठाना ही पड़ेगा,


मई 14, 2013

विरोधाभास


प्रिय ब्लॉगगर साथियों,

माफ़ी चाहूँगा की पिछले कुछ दिनों से व्यस्तता के चलते आप सबके ब्लॉग पर आना नहीं हुआ........समय मिलते ही आपके सभी के ब्लॉग पर उपस्थित होऊँगा...........आज एक हलकी फुलकी सी नज़्म लिखी है....... थोडा सा मुस्कुराते हुए भी बात पर गौर ज़रूर किजिएगा........मकसद है इसमें भी :-))

एक बात आज पहली बार अपने ब्लॉग पर बिना किसी तस्वीर के पोस्ट डाल रहा हूँ बतौर एक प्रयोग....... उम्मीद है आपको पसंद आये.......अपनी बेबाक राय निष्पक्ष दें.......इंतज़ार रहेगा । 
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उस रोज़ यूँ ही बाज़ार में घूमते-घूमते 
बुक स्टाल पर खड़ी हो गई जाकर,
यूँ ही किताब के  पन्ने पलटते हुए 
एक नज़्म पर आँखें जमी रह गईं थी, 
एक ही साँस में पूरी नज़्म पढ़ डाली थी तब,
जैसे अन्दर तक भिगो गई थी नज़्म
किताब का उन्वान देखा 'सागर का साहिल' 
किसी शायर 'साहिल' की नज्में थीं उसमें,
घर आते ही पूरी किताब ख़त्म कर डाली,
देखते ही देखते 'साहिल' ने अलमारी पर 
और दिल पर भी कब्ज़ा कर लिया,

उसकी नज्में ही बिछाने और ऒढने लगी 
न जाने कब 'साहिल' जिंदगी का साहिल बन गया,
उसे देखने की, उससे बातें करने की 
एक हूक सी दिल में उठने लगी
यहाँ वहाँ भागदौड़ करके आखिर 
साहिल का पता ढूँढ ही निकाला
इतवार के रोज़ सुबह ही तैयार होकर 
अपने 'साहिल' से मिलने के लिए पहुँची
पुराने शहर की एक तंग से गली में मकान था 
रास्ते पर यहाँ वहाँ कूड़ा बिखरा पड़ा था 
घर पहुँच कर पता चला 'वो' अकेले रहते हैं 
और अक्सर घर पर नहीं पाए जाते है,
शायद नुक्कड़ की चाय की दुकान पर मिलें,

वहाँ पहुँची तो पता चला की उधर टेबल पर बैठे हैं
जो उधर देखा तो यकीन नहीं हुआ की यही है 
मैला कुचैला सा सफ़ेद कुरता पायजामा 
बिखरे बेतरतीब बाल, बढ़ी हुई दाढ़ी 
पास जाकर पूछा 'साहिल' साहब आप ही हैं ?
पान की एक लाल-लाल पीक थूक कर
और उसी रंग के दाँत दिखाकर   
उन्होंने फ़रमाया ' जी, हाँ ........मैं ही हूँ'
कहिये आप की क्या खिदमत करूँ,
मुझसे और कुछ भी कहते-सुनते न बना 
चुपचाप वहाँ से लम्बे डग भरती हुई भागी 

रास्ते भर यही सोचती रही की इतना विरोधाभास
इतनी रूमानी ग़ज़लें लिखने वाला शायर 
खुद इस तरह की जिंदगी जीता है 
खुद अकेले रहने वाला शख्स
जिंदगी भर साथ की बाते करता हैं 
कुदरत की खूबसूरती की तारीफें करने वाला
खुद इतनी गंदगी में कैसे जी लेता है
सोचते-सोचते "ग़ालिब" साहब का ख्याल आया
फिर न जाने क्यूँ खुद ही हँसी छूट गई
ख्यालों और हकीक़त में यही फासला है,
रचना और रचनाकार में भी भेद होता है,
कथनी और करनी का भी यही फर्क है शायद,

मई 02, 2013

बदलाव



वो रात के चमकते हुए सितारे हों 
या दिन में तपता हुआ सूरज
वो सुबह की मखमली ओस हो 
या आसमान से गिरती बारिश 

वो सदा बहता हुआ दरिया हो 
या फिर अटल खड़े हुए पर्वत,
वो फूलों की महकती खुशबू हो 
या सुलगती हुई चिता की राख,

बस हर, तरफ हर ओर यही देखा मैंने 
इस क़ायनात में कुछ भी क़ायम नहीं,
बदलाव ही बदलाव है यहाँ सब तरफ
एक चीज़ मिटती है तो दूसरी बनती है,

पल भर में विश्वास बदल जाते हैं 
एक ठोकर में श्रृद्धाएँ डगमगाती हैं,
कहीं भी नहीं रुकता है ये सिलसिला 
जो आज है वो कल नहीं रहता है,

निशानियाँ ही निशानियाँ बिखेरी है 
मेरे रब ने बन्दे के लिए दुनिया में, 
ताकि इंसान को सदा ये याद रहे कि
इस क़ायनात में कुछ भी क़ायम नहीं, 


अप्रैल 10, 2013

हकीक़त



तेरे देखते-देखते दुनिया कहाँ से कहाँ निकल गई 
एक तू है जो अभी तक ख्यालों में कहीं खो रहा है,  

देखना इन्हीं से होंगे एक रोज़ खुद तेरे पाँव घायल
आज जिन काँटों को तू दूसरों के लिए बो रहा है,

शायद यही है जिंदगी की हकीक़त ए ! मेरे खुदा
मौजों में है सफीना और माँझी गाफ़िल सो रहा है,

बख्श देगा शायद क़यामत के रोज़ ख़ुदा उसको 
करके तौबा अब अमाल से गुनाहों को धो रहा है, 

यहाँ कौन है जो किसी के बोझ को उठा ले 'इमरान'
हर शख्स अपना सलीब अपनी पीठ पर खुद ढो रहा है, 

अप्रैल 02, 2013

सत्य



'सत्य' एक अनसुलझा सा शब्द 
या जीवन भर की एक खोज,
कितने लोगों से कितनी ही बार 
सुनता रहा हूँ  'सत्य' के बारे में 

पर नहीं देता किसी पर ज्ञान-ध्यान 
अपने ही अनुभवों में खोजता हूँ इसे,
और जो स्वयं से सीख पाया हूँ वह है 
'सत्य' कहना कही अधिक सरल है 
अपेक्षा 'सत्य' को सुनने के,

पिघले हुए सीसे के सामान ही 
कई बार गिरता है ये कानों में,
और भीतर जो 'मैं' कि एक परत है 
बहुत यत्नों से बनाता है मनुष्य जिसे
क्षण में ही छिन्न-भिन्न कर देता है,

मैं, तुम या सम्पूर्ण संसार, कोई नहीं 
जो 'सत्य' को सुनने के लिए राज़ी हो 
पुरखों या किताबों से 'सत्य' नहीं मिलता 
'सत्य' केवल एक शब्द मात्र नहीं 
यही जीवन का एकमात्र 'लक्ष्य' है,

मार्च 19, 2013

मैं....मेरा दिल.... और मंज़िल


प्रिय ब्लॉगर साथियों, 

आज एक नज़्म पेश-ए-खिदमत है .....इसे दुबारा पोस्ट कर रह हूँ इस उम्मीद में की आप फिर से इसका भरपूर लुत्फ़ लें और कुछ कदरन नए पाठक भी इसे पढ़ पायें । नज़्म का शीर्षक है ' मैं, मेरा दिल और मंज़िल' जैसे नाम से ज़ाहिर है नज़्म में मंज़िल को लेकर 'मैं और मेरे दिल' के बीच की कशमकश है...........शायद कुछ लम्बी हो गयी है आपसे दरख्वास्त है की थोडा सा वक़्त दे कर इसे पूरा ज़रूर पढ़े...............बाकी आपको कैसी लगी ये ज़रूर बताएं - 
न जाने क्यूँ कभी कभी ये ख्याल दिल में आता है की निकल पडूँ
किसी ऐसी जगह जहाँ दुनिया का गम न हो 
और न हो किसी की जुस्तजू
मगर इस दिल का क्या करूँ, शायद वहाँ भी न लगे
और माँगे कुछ दर्द, जो जाने हो या अनजाने 
कुछ आदत सी हो गयी है इस वीराने दिल को दर्द की
हर घड़ी, हर पल बेचैन सा क्यूँ रहता है ये दिल
न जाने कब कहाँ जाकर ख़त्म होगा ये सफ़र?
कहने को तो कट ही जायेगा ये सफ़र कभी न कभी
मगर क्या सुकूँ मिलेगा इस दिल को ख़ाकसार होने के बाद भी?

हर रात को ये दिल मेरा कहता है मुझसे कि ए ! मुसाफिर
तू इसलिए नहीं बना कि यूँ पैरों में बेड़ियाँ डाल कर पड़ा रह
और मनाता रहे मातम कि लगता ही नहीं दिल कहीं 
आज़ाद परिंदों कि तरह परवाज़ ही तेरा मुक़द्दर है 
परवाज़ के बगैर तो परिंदों के परों को भी जंक लग जाती है 
और अगर यूँ ही पड़ा रहा तो लग जाएगी जंक तुझे भी

कभी सन्नाटे में आसमान कि तरफ देख 
क्या तुझे नहीं सुनाई पड़ती वो आवाजें, जो जाने कहाँ से आती हैं?
चाँद के आस-पास जो नूर बिखरा पड़ा है, शायद वहां से,
या फिर इन सितारों से, या दूर कहीं वीरानों से,
ये आवाज़े हैं जो खींचती है इस दिल को 
और तब ये दिल खींचता है मुझको 
कभी कहता कि चल मुसाफिर 
चल के बैठे दरिया के किनारे और करें कुछ बातें
पर थोड़ी ही देर बाद कहता नहीं, रास्ता गलत चुना
चल चलके भटकते हैं दश्त के वीरानों में, पर वहाँ सुकुन कहाँ?
या चल रात में तारों को देखते हैं, शायद इन्हीं में कहीं मंजिल हो

कभी जब बरसात में भीगा-भीगा सा समां हो 
और दरख्तों के पत्तों से टपक रही हो कुछ बूँदे
जैसे ज़मीन पर दस्तक दे रहीं हो,
और अगर रात में हो बरसात और चाँद झाँक रहा हो बादलों में से  
चाँदनी कि चादर ने ढक लिया हो पूरे समां को 
और तब कहीं से सुनाई पड़े एक संगीत 
जो रूह को अन्दर तक भिगो जाये
तब तन्हाई लपेट ले इस जिस्म को और ये हूक़ सी उठे कहीं से
कि काश कोई साथ होता इस वक़्त तो इस बारिश, इस चाँदनी 
हर चीज़ में मदहोशी सी होती,  तब फिर देता अचानक आवाज़

ए ! मुसाफिर कहाँ खो गए ? क्या मंजिल नहीं पानी?
पहले चल के मंजिल को ढूंढेंगे, पर रास्ते में ठिठकना नहीं
साथी कि तलाश में रहे तो मंजिल भी जाएगी
और रास्ते से भटकने कि तोहमत भी लग जाएगी 
अँधेरे में रहकर पहले रौशनी कि तलाश करो

मैं कहूँ इससे कि अगर रौशनी मिल जाये 
तो तू ठहर जायेगा, मिलेगा सुकूं तुझे?
नहीं...जवाब देगा सुकूं इंसान के लिए नहीं बना 
वो सिर्फ एक जगह मिलता है और वो है मंज़िल
चल उठ मुसाफिर और चल तलाश में मंज़िल की
परिंदे कभी नहीं रुकते, क्योंकि 
परवाज़, परवाज़ और परवाज़, ये परिंदों का मुक़द्दर है
ये परिंदों की जिंदगी है इसमें रिश्तों की बेड़ियाँ मत डाल 

मैं कहूँ की अगर परिंदों को भी हमसफ़र की ज़रूरत हो तो?
तो कहेगा की अगर सागर पर परवाज़ कर रहे हो 
तो क्या गहरे नीले पानी की सतह पर हमसफ़र को ढूंढोगे?

हमसफ़र वहीँ है जहाँ मंज़िल है 
जहाँ मंज़िल नहीं वहाँ रास्ता नहीं
जहाँ रास्ता नहीं वहाँ सफ़र नहीं
जब सफ़र नहीं तो हमसफ़र कैसा?

तोड़ दो साड़ी बेड़ियाँ और उठो मुसाफिर
आओ निकल पड़े इस सफ़र पर बगैर हमसफ़र के
ढूँढने से कभी न कभी तो मिल ही जाएगी मंज़िल भी
             

फ़रवरी 27, 2013

कस्तूरी


जहाँ कहीं जिस ओर भी इशारा मिला
उसी तरफ उसे ढूँढता रहा बढ़ता रहा 
कभी इससे पूछता तो कभी उससे 
कहीं कोई सुराग नहीं मिलता था 
दूसरे तो जैसे अंजान थे उससे,

ये ख़ुशबू सिर्फ उसे ही आती 
दिल-ओ-दिमाग पर छा जाती  
एक मदहोशी का आलम बनता  
कुछ देर अपने को भी भूल जाता 

जहाँ भी वो जाता उसके साथ होती 
ढूँढने पर न जाने कहाँ खो जाती
यहाँ वहाँ जाने कहाँ कहाँ ढूँढा उसे 
जिसने जो बताया वही किया उसने 

एक रोज़ थक कर बैठ गया वो 
बंद करके आँखें देखा अपने भीतर
जो उसे पागल बनाये दे रही थी 
वो खुशबू तो थी उसके अपने ही अन्दर 

अब उसने जाना वो तो सदा से थी
बस वही कभी उसे जान नहीं पाया 
वो खुशबू जो उसे एक मामूली से 
'कस्तूरी' बनाती है सदा के लिए,
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नोट - ये पोस्ट मैंने दोनों को ख्याल में ले कर लिखी है 'हिरन' और 'मनुष्य' जो आपको भाए आप वो मतलब लें ले । इसलिए कहीं पर भी दोनों का ही ज़िक्र नहीं किया है.......प्रयास कैसा रहा.....आपकी अमूल्य राय की प्रतीक्षा में.......


फ़रवरी 20, 2013

अब के बहार



अब के बहार चुनर मोरी रंग दे......

तूने बख्शी तो दी मुझको ये कोरी 
मौला ! हो गई चुनर मोरी मैली, 

अब के बहार चुनर मोरी रंग दे...... 

दिखते रहे मुझे हर तरफ सब्ज़बाग़ 
साथ लगते रहे मोरी चुनरी में दाग, 

अब के बहार चुनर मोरी रंग दे...... 

हो मोरी चुनर में रंग हरा, पीला और लाल 
कितना बेचैन हूँ मैं, तू ही जाने मेरा हाल, 

अब के बहार चुनर मोरी रंग दे.......

रंगरेज़ मेरे ऐसे रंगियो कि रंग नहीं छूटे 
तुझसे लगी अब मेरी ये लौ नहीं छूटे, 

अब के बहार चुनर मोरी रंग दे.......

कर मुझ पर मेरे रंगरेज़ इतना सा अहसान 
तेरा था, तेरा है और तेरा रहेगा ये 'इमरान'

अब के बहार चुनर मोरी रंग दे.......

फ़रवरी 12, 2013

हासिल



कभी खीझकर बाहर के शोर से कान बंद कर लेता हूँ
तो अपने ही भीतर का शोर मुझे पागल बनाने लगता है,

इस दौर में वही कामयाबी की मंजिल तक पहुँचता है 
जो हर कदम पर अपनी आत्मा को दबाने लगता है, 

अब उस बुज़ुर्ग से हर कोई बच के गुज़रता है, क्योंकि 
कहते है जिसे पाता है किस्से पुराने सुनाने लगता है,

पाक़ क़िताब में वादा है उसका, वो ज़रूर सुनता है सदा 
मगर जब कोई सच्चे दिल से उसे बुलाने लगता है 

नहीं मिलता है दोनों जहाँ में उसका हासिल 'इमरान'
करके अहसान किसी पर जो उसको जताने लगता है,