फ़रवरी 12, 2014

प्यार और प्यार

दोस्तों,

आप सभी का शुक्रिया जो 'चल यार मनाएंगे' आपको पसंद आई । कुछ लोगों ने कहा और खुद मुझे भी लगा कि इसे धुन में पिरो कर गुनगुनाने लायक बनाना चाहिए । तो एक छोटा सा प्रयास किया जिसे आप यहाँ (विडियो यू ट्यूब पर ) देख सकते है |
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फरवरी का गुलाबी मौसम
फिजाओं में महकती फूलों की खुशबू  
तन-मन को गुदगुदाती बसंती बयार  
हर तरफ फैला हुआ एक खुमार
कुछ और नहीं बस प्यार और प्यार,

अनगिनत परिभाषाएं,असंख्य अभिव्यक्तियाँ
फिर भी अनकहा सा,  अनसुलझा सा 
सिर्फ मेरे और तुम्हारे अनुभव पर आधारित 
कहाँ बाँध सका कोई इसे शब्दों में 
कहाँ कह सका कोई इसे जुबां से
दिल से दिल तक बंधा एक तार 
कुछ और नहीं बस प्यार और प्यार,



फ़रवरी 01, 2014

चल यार मनाएंगे


मिसरा एक सूफी कव्वाली का  'चल यार मनाएं' सुना था कहीं । उसके गिर्द एक सूफियाना क़लाम बुना है, इसमें सिर्फ इस एक मिसरे के सिवा बाकि सब इस 'इमरान' ने ही कहा है | यहाँ 'यार' 'गुरु' को कहा गया है, इसे ख्याल में रखें और सब कुछ भूल कर कुछ देर को डूब जाएँ इस समंदर में |
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चल री सखी ! चल यार मनाएंगे

जिसके रंग में रंगे हम जोगी 
साथ उसके ही रास रचाएंगे, 

चल री सखी ! चल यार मनाएंगे

नज़रों ने किया घायल जिसकी  
उसको ही हम दिलदार बनाएंगे, 

चल री सखी ! चल यार मनाएंगे

आई है जिससे ज़िंदगी में बहार
    वफ़ा का उसको हार पहनाएंगे,  

चल री सखी ! चल यार मनाएंगे

छुपाने से कहीं खो न जाएँ ख़ज़ाने 
पाई दौलत दोनों हाथों से लुटाएंगे, 

चल री सखी ! चल यार मनाएंगे

जहाँ खोजी ख़ुशी वहाँ मिले गम 
 अब न यूँ बाकि उमर गवाएंगे, 

चल री सखी ! चल यार मनाएंगे

ख़ाली झोली कुछ नहीं अपने पल्ले 
रोज़ फ़क़ीर मगर त्योहार मनाएंगे, 

चल री सखी ! चल यार मनाएंगे

खुद भी जिसमें होश बाकि  न रहे 
करके ऐसा रक़्स उसको रिझाएंगे, 

चल री सखी ! चल यार मनाएंगे