अक्टूबर 25, 2026

ग़ज़ल - शोर | Ghazal - Shor | Hindi Shayari | Poetry #ghazal


Ghazal Shor by jazbaattheemotionsblogspot.com

कभी खीझकर बाहर के शोर से कान बंद कर लेता हूँ
तो अपने ही भीतर का शोर मुझे पागल बनाने लगता है,

इस दौर में वही कामयाबी की मंजिल तक पहुँचता है 
जो हर कदम पर अपनी आत्मा को दबाने लगता है, 

अब उस बुज़ुर्ग से हर कोई बच के गुज़रता है, क्योंकि 
कहते है जिसे पाता है किस्से पुराने सुनाने लगता है,

पाक़ क़िताब में वादा है उसका, वो ज़रूर सुनता है सदा 
मगर जब कोई सच्चे दिल से उसे बुलाने लगता है 

नहीं मिलता है दोनों जहाँ में उसका हासिल 'इमरान'
करके अहसान किसी पर जो उसको जताने लगता है,
© इमरान अंसारी
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अक्टूबर 20, 2026

अशआर - इज़्ज़त (Izzat) - Hindi Urdu Shayari | ज़िंदगी शायरी | Zindagi Shayari

 


खर्च करते हैं जो अपना माल ख़ुदा की राह में

उनको ज़िन्दगी में कभी किल्लत नहीं होती,

और करते हैं जो अपने बुज़ुर्गों की इज़्ज़त

इस जहाँ में कभी उनकी ज़िल्लत नहीं होती,


© इमरान अंसारी 


अक्टूबर 14, 2026

पत्थर का शहर (Patthar ka Shahar) Hindi Ghazal | Hindi Shayari | Zindagi Shayari

 

Ghazal- Patthar ka Shahar by Imran ansari

नदी के किनारे खड़ा मगर है

मर रहा प्यास से वो शजर है,

 

राह तो मंज़िल को सीधी जाती है

उलझनों में अपनी फंसा बशर है,

 

इतरा के ज़मीं पे चलते जो कभी

देख! उनका हुआ क्या हशर है,

 

एक नहीं चलती है इंसान की

होता जब भी नाज़िल कहर है,

 

बोझ है सीने में गुनाहों का

झुकी इसलिए ही नज़र है,

 

मिलता है तुझे वो गले तपाक से

संभल के, भरा सीने में ज़हर है,

 

काँच के एहसास तेरे ‘इमरान’

याद रहे! ये पत्थर का शहर है,


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अक्टूबर 04, 2026

सूफियाना अशआर - इबादत । हिंदी शायरी ।

 


कैसे बांध सकेगा तू! बंदे हर चीज़ आनी-जानी है,


नहीं रहेगा कुछ कायम यहाँ हर शय फ़ानी है,


बिता ले इबादत में इसे चार दिन की ज़िंदगानी है


आज ही आज है फ़क़त कल तो बस कहानी है,


© इमरान अंसारी

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सितंबर 22, 2026

हिंदी ग़ज़ल - आ ! नंगे पैर रेत पर चलें । ज़िंदगी पर शायरी



आ ! नंगे पैर रेत पर चलें

खुशबू से हवाओं में घुलें,

 

बाँसुरी की तान पर झूमें

आहिस्ता से फूलों को चूमें,

 

दरिया में पैरों को झुलायें

बादलों में तस्वीरें बनाएं,

 

आँगन में पौधे उगाएँ,

मिट्टी के घरौंदे बनाएँ

 

पेड़ की डालों पर लटकें

धूप में तितलियाँ पकड़ें,

 

भुला दें सारे शिकवे-गिले

दोस्त बनें, चल गले मिलें,

 

आँखों में कुछ ख्वाब बुनें

चल फिर से इंसान बनें,

 

आ ! नंगे पैर रेत पर चलें

खुशबू से हवाओं में घुलें,


©इमरान अंसारी

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