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खर्च करते हैं जो अपना माल ख़ुदा की राह में
उनको ज़िन्दगी में कभी किल्लत नहीं होती,
और करते हैं जो अपने बुज़ुर्गों की इज़्ज़त
इस जहाँ में कभी उनकी ज़िल्लत नहीं होती,
© इमरान अंसारी
नदी
के किनारे खड़ा मगर है
मर
रहा प्यास से वो शजर है,
राह
तो मंज़िल को सीधी जाती है
उलझनों
में अपनी फंसा बशर है,
इतरा
के ज़मीं पे चलते जो कभी
देख!
उनका हुआ क्या हशर है,
एक
नहीं चलती है इंसान की
होता
जब भी नाज़िल कहर है,
बोझ
है सीने में गुनाहों का
झुकी
इसलिए ही नज़र है,
मिलता
है तुझे वो गले तपाक से
संभल
के, भरा
सीने में ज़हर है,
काँच
के एहसास तेरे ‘इमरान’
याद
रहे! ये पत्थर का शहर है,
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कैसे बांध सकेगा तू! बंदे हर चीज़ आनी-जानी है,
नहीं रहेगा कुछ कायम यहाँ हर शय फ़ानी है,
बिता ले इबादत में इसे चार दिन की ज़िंदगानी है
आज ही आज है फ़क़त कल तो बस कहानी है,
© इमरान अंसारी
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आ !
नंगे पैर रेत पर चलें
खुशबू
से हवाओं में घुलें,
बाँसुरी
की तान पर झूमें
आहिस्ता
से फूलों को चूमें,
दरिया
में पैरों को झुलायें
बादलों
में तस्वीरें बनाएं,
आँगन
में पौधे उगाएँ,
मिट्टी
के घरौंदे बनाएँ
पेड़
की डालों पर लटकें
धूप
में तितलियाँ पकड़ें,
भुला
दें सारे शिकवे-गिले
दोस्त
बनें, चल
गले मिलें,
आँखों
में कुछ ख्वाब बुनें
चल
फिर से इंसान बनें,
आ !
नंगे पैर रेत पर चलें
खुशबू
से हवाओं में घुलें,
©इमरान अंसारी
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