दिसंबर 13, 2011

कुन फाया कुन


आज एक बहुत ही प्यारा गीत फिल्म 'रॉक स्टार' से जिसे 'इरशाद कामिल' ने लिखा है  'जावेद अली' ने गाया है और 'रहमान' ने इसमें अपने संगीत से जादू भर दिया है.......रूह को सुकून देने वाला ये रूहानी सूफी गीत मुझे बहुत पसंद आया.......दिल हुआ आपसे बाँटने का | ये आज पहली बार है जब मैंने किसी फिल्म के गीत को चुना है पर मैं रोक नहीं पाया खुद को क्योंकि मुझे ये बहुत पसंद आया.......सलाम है इसके बनने में जुड़ने वाले सभी लोगों को|

'कुन फाया कुन' कुरान शरीफ की एक आयत 'यासीन शरीफ' से लिया गया है जिसका मतलब है जब दुनिया में कुछ नहीं था तो खुदा ने दुनिया से कहा हो जा और वो हो गयी यानि जब कुछ नहीं था तब भी खुदा था और जब कुछ नहीं होगा तब भी खुदा होगा........या मौला हमे नेकी की राह पर चलने की तौफिक दे.......आमीन|
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कदम बढ़ा ले हदों को मिटा ले
आजा खाली पल में पी (पिया) का घर तेरा
तेरे बिन खाली  आ जा खालीपन में

कुन फाया कुन फाया कुन

जब कहीं पे भी नहीं था
वही था, वही था

वो जो मुझमें समाया 
वो जो तुझमें समाया
मौला वही-वही माया

रंगरेज़ा रंग मेरा तन मेरा मन
ले ले रंगाई चाहे तन चाहे मन

सजरा सवेरा मेरे तन बरसे
कजरा अँधेरा तेरी जलती लौ
कतरा मिला जो तेरे दर बरसे

मुझपे करम सरकार तेरा अरज तुझे 
कर दे मुझे मुझसे ही रिहा
अब मुझको भी हो दीदार मेरा
कर दे मुझे मुझसे ही रिहा


मन के मेरे ये भरम 
कच्चे मेरे ये करम
लेके चले हैं कहाँ 
मैं तो जानूँ ही ना

तू है मुझमें समाया 
कहाँ लेके मुझे आया
मैं हूँ तुझमें समाया 
तेरे पीछे चला आया

तेरा ही मैं एक साया 
तूने मुझको बनाया 
मैं तो जग को न भाया 
तूने गले से लगाया

हक तू ही है खुदाया
सच तू ही है खुदाया
कुन फाया कुन फाया कुन

दिसंबर 06, 2011

आत्मदाह


प्रिय ब्लॉगर साथियों,

आज की पोस्ट एक सत्य घटना पर आधारित है, जो मेरे आस पास के समाज में घटित हुई थी अभी कुछ दिन पहले की ही बात है एक किशोरी ने खुद को जलाकर आत्महत्या कर ली | मैं उसे उसके बचपन से जानता था.......पहले तो काफी वक़्त मैं यकीन ही नहीं कर पाया| पर सच को स्वीकार करना ही पड़ता है .......खैर आपसे बांटना चाहता था पर समझ नहीं आता था कि इसको शब्द कैसे दूँ..... पहले सोचा कि गद्य रूप में लिखूँ पर बाद में लगा शायद इस रूप में ज्यादा बेहतर हो.......आपकी राय की प्रतीक्षा रहेगी कि मैं  अपने प्रयास में कहाँ तक सफल रहा ?.......कोई सुझाव हो या कोई गलती लगे तो निसंकोच कहें|  
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क्या उम्र रही होगी उस किशोरी की
शायद यही कोई सोलह या सत्रह बरस
अभी तो जिंदगी की दहलीज़ पर  
जैसे उसके क़दम बस पड़े ही थे,

ज़ेहन में ये सवाल बार-बार उठता है
की आखिर क्यूँ ? उसने इतना बड़ा फैसला किया
आखिर क्या वजह रही होगी इसकी?
जो उसने 'आत्मदाह' जैसा क़दम उठा लिया,

अभी कल ही की तो बात लगती है
कितने बरस हुए होंगे?
यही कोई शायद पाँच या छः बरस 
जब पहली बार मैंने उसे देखा था,

बात-बेबात पर हँसने वाली 
अपनी बहन की चोटी खींचने वाली
छोटे भाइयों से लड़ने वाली
मासूम सी एक बच्ची ही तो थी वो,

आखिर क्या वजह थी 'आत्मदाह' की
शायद घर में होती हर वक़्त की कलह
रोज़ पीकर आता शराबी बाप
या बात-बात पर ताने मारती माँ,

अन्दर ही अन्दर घुटती उसकी आकांक्षाये 
या सिर्फ देहरी पर खड़े हो जाने से
अपने हमउम्र किसी से हँस-बोल लेने से
चरित्र पर ऊँगली उठाता ये तथाकथित समाज,

कितना अकेला पाया होगा उसने खुद को
अपने ही परिवार में कोई साथी नहीं
जबसे बहन की शादी हुई, कोई भी तो नहीं
जिससे वो अपने मन की व्यथा कह पाती

आज भी न जाने क्यूँ यकीन नहीं आता
की आखिर उसने 'आत्मदाह' क्यूँ किया?
जब कभी सोचता हूँ उसके बारे में
तो एक हँसता मुस्कुराता चेहरा 
आँखों के आगे घूम जाता है,

कितना वीभत्स हो गया था वही चेहरा
ऐसा कि दृश्य भी सर झुका ले
दफ़न के वक़्त आखिरी बार देखने कि रस्म
पर लोगों में  हिम्मत नहीं थी शायद देखने की,

पर सुना है उसके जाने के बाद 
अब उसके बाप ने शराब छोड़ दी है,
और सुधर गयी अब माँ भी 
ढूँढ रहा है समाज अब नया शिकार,

वो 'आत्मदाह' था या 'बलि'
यही सवाल गूँज उठता है 
आखिर कौन था दोषी ?
उसके 'आत्मदाह' के पीछे 

क्या उम्र रही होगी उस किशोरी की
शायद यही कोई सोलह या सत्रह बरस
अभी तो जिंदगी की दहलीज़ पर  
जैसे उसके क़दम बस पड़े ही थे,


अक्टूबर 31, 2011

मैं, मेरा दिल और मंज़िल


प्रिय ब्लॉगर साथियों,

आज एक नज़्म पेश-ए-खिदमत है कुछ दिन पहले जैसे कलम ने खुद जन्मी ये नज़्म......नज़्म का शीर्षक है ' मैं, मेरा दिल और मंज़िल' जैसे नाम से ज़ाहिर है नज़्म में मंज़िल को लेकर 'मैं और मेरे दिल' के बीच की कशमकश है...........शायद कुछ लम्बी हो गयी है आपसे दरख्वास्त है की थोडा सा वक़्त दे कर इसे पूरा ज़रूर पढ़े........बाकी आपको कैसी लगी ये ज़रूर बताएं - 

न जाने क्यूँ कभी कभी ये ख्याल दिल में आता है की निकल पडूँ
किसी ऐसी जगह जहाँ दुनिया का गम न हो 
और न हो किसी की जुस्तजू
मगर इस दिल का क्या करूँ, शायद वहाँ भी न लगे
और माँगे कुछ दर्द, जो जाने हो या अनजाने 
कुछ आदत सी हो गयी है इस वीराने दिल को दर्द की
हर घड़ी, हर पल बेचैन सा क्यूँ रहता है ये दिल
न जाने कब कहाँ जाकर ख़त्म होगा ये सफ़र?
कहने को तो कट ही जायेगा ये सफ़र कभी न कभी
मगर क्या सुकूँ मिलेगा इस दिल को ख़ाकसार होने के बाद भी?

हर रात को ये दिल मेरा कहता है मुझसे कि ए ! मुसाफिर
तू इसलिए नहीं बना कि यूँ पैरों में बेड़ियाँ डाल कर पड़ा रह
और मनाता रहे मातम कि लगता ही नहीं दिल कहीं 
आज़ाद परिंदों कि तरह परवाज़ ही तेरा मुक़द्दर है 
परवाज़ के बगैर तो परिंदों के परों को भी जंक लग जाती है 
और अगर यूँ ही पड़ा रहा तो लग जाएगी जंक तुझे भी

कभी सन्नाटे में आसमान कि तरफ देख 
क्या तुझे नहीं सुनाई पड़ती वो आवाजें, जो जाने कहाँ से आती हैं?
चाँद के आस-पास जो नूर बिखरा पड़ा है, शायद वहां से,
या फिर इन सितारों से, या दूर कहीं वीरानों से,
ये आवाज़े हैं जो खींचती है इस दिल को 
और तब ये दिल खींचता है मुझको 
कभी कहता कि चल मुसाफिर 
चल के बैठे दरिया के किनारे और करें कुछ बातें
पर थोड़ी ही देर बाद कहता नहीं, रास्ता गलत चुना
चल चलके भटकते हैं दश्त के वीरानों में, पर वहाँ सुकुन कहाँ?
या चल रात में तारों को देखते हैं, शायद इन्हीं में कहीं मंजिल हो

कभी जब बरसात में भीगा-भीगा सा समां हो 
और दरख्तों के पत्तों से टपक रही हो कुछ बूँदे
जैसे ज़मीन पर दस्तक दे रहीं हो,
और अगर रात में हो बरसात और चाँद झाँक रहा हो बादलों में से  
चाँदनी कि चादर ने ढक लिया हो पूरे समां को 
और तब कहीं से सुनाई पड़े एक संगीत 
जो रूह को अन्दर तक भिगो जाये
तब तन्हाई लपेट ले इस जिस्म को और ये हूक़ सी उठे कहीं से
कि काश कोई साथ होता इस वक़्त तो इस बारिश, इस चाँदनी 
हर चीज़ में मदहोशी सी होती,  तब फिर देता अचानक आवाज़

ए ! मुसाफिर कहाँ खो गए ? क्या मंजिल नहीं पानी?
पहले चल के मंजिल को ढूंढेंगे, पर रास्ते में ठिठकना नहीं
साथी कि तलाश में रहे तो मंजिल भी जाएगी
और रास्ते से भटकने कि तोहमत भी लग जाएगी 
अँधेरे में रहकर पहले रौशनी कि तलाश करो

मैं कहूँ इससे कि अगर रौशनी मिल जाये 
तो तू ठहर जायेगा, मिलेगा सुकूं तुझे?
नहीं...जवाब देगा सुकूं इंसान के लिए नहीं बना 
वो सिर्फ एक जगह मिलता है और वो है मंज़िल
चल उठ मुसाफिर और चल तलाश में मंज़िल की
परिंदे कभी नहीं रुकते, क्योंकि 
परवाज़, परवाज़ और परवाज़, ये परिंदों का मुक़द्दर है
ये परिंदों की जिंदगी है इसमें रिश्तों की बेड़ियाँ मत डाल 

मैं कहूँ की अगर परिंदों को भी हमसफ़र की ज़रूरत हो तो?
तो कहेगा की अगर सागर पर परवाज़ कर रहे हो 
तो क्या गहरे नीले पानी की सतह पर हमसफ़र को ढूंढोगे?

हमसफ़र वहीँ है जहाँ मंज़िल है 
जहाँ मंज़िल नहीं वहाँ रास्ता नहीं
जहाँ रास्ता नहीं वहाँ सफ़र नहीं
जब सफ़र नहीं तो हमसफ़र कैसा?

तोड़ दो साड़ी बेड़ियाँ और उठो मुसाफिर
आओ निकल पड़े इस सफ़र पर बगैर हमसफ़र के
ढूँढने से कभी न कभी तो मिल ही जाएगी मंज़िल भी
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ख़ाकसार   - मिट्टी में मिलना 
दश्त         -  जंगल 
दरख्तों     -  पेड़ों 

अप्रैल 15, 2011

आईना पूछता हैं मुझसे ये सवाल



आईना पूछता हैं मुझसे ये सवाल
क्यूँ है तेरे चेहरे का ये बुरा हाल,

सर्दी में भी ये बदन जलता है,
रंग जहाँ का देख के बदलता है,

जो नज़र नहीं आता किसी सू 
मेरे अन्दर ये कौन चलता है,

बदगुमानी बदसलूकी करती है
लाचारी साफ-साफ  झलकती है,

चश्मदीदे गवाही को गलत जानिये
आईना  झूठा है, न इसे सच मानिए,

जो हासिल है उसमे ही जीया कीजिये
शराबे - ए - जिंदगी को पीया कीजिये,

मार्च 31, 2011

शब्द




शब्द....किसके हैं ये शब्द?
क्या तेरे, क्या मेरे ?
क्या कभी किसी के हुए हैं ?
ये शब्द.....

इस विराट में शब्द नहीं हैं,
है तो सिर्फ एक नाद 
जो अनहत गूँजता है, 
और उस नाद को 
वर्णित करने के लिए ही तो 
शब्दों के वस्त्र बनाते हैं हम,

फिर क्या फर्क है, कि किसी के 
वस्त्र उजले हैं, और किसी के स्याह
क्या संसार के शब्दकोश में
कोई भी ऐसा शब्द है,
जो उस अनकहे
को अभिव्यक्ति दे,

क्यों है शब्दों की इतनी अहमियत ?
क्या केवल शब्दों को 
क्रम देने से ही
शब्दों पर छाप पड़ जाती है ?
'सर्वाधिकार सुरक्षित' हो जाते हैं ?

कभी सोचा है तुमने की तुम 
शब्दों पर अपने अधिकार 
को सुरक्षित करते हो ....
क्या सच में तुम ऐसा कर सकते हो ?

क्या कभी कोई उस क्रम को थोड़ा
सा बिगाड़कर, थोड़ा इधर 
या थोड़ा सा उधर सरकाकर
तुम्हारे 'सर्वाधिकार' को
'असुरक्षित' नहीं कर देता है 
फिर कैसा अधिकार है ये ?

क्या कभी अनुमान किया है 
कि इन शब्दों के माध्यम 
से ही इस संसार में
प्रतिपल कितनी बकवास 
की जाती है ?
कितनो के खिलाफ ज़हर 
उगला जाता है?
कितने लोगों को लड़ाया 
जाता है ?

अरे जागो, 
शब्दों के पीछे मत भागो
ये तो सिर्फ एक जाल है,
शब्द अभिव्यक्ति का मात्र माध्यम हैं
और इन अधिकारों के चक्कर 
में तुम वो तो भूल ही जाते हो
जिसको कहने के लिए
इन शब्दों का सहारा लिया गया,

थोड़ा सा गहराई में जाओ.....
थोड़ा सा डूबो उस रस में 
जो शब्दों से परे है,
जैसे दिल की धडकन
बिना कहे कुछ कहती है,
जैसे साँसों की गरमी,
जैसे हाथों कि नरमी,
जैसे मतवाले नैनो की बोली
बिना बोले भी बोलती है, 
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अगर किसी के 'सर्वाधिकार सुरक्षित' में से कोई शब्द भटककर इधर आ निकला हो तो कृपया उसे खींच के यहाँ से ले जाकर सुरक्षित करें :-)