नदी
के किनारे खड़ा मगर है
मर
रहा प्यास से वो शजर है,
राह
तो मंज़िल को सीधी जाती है
उलझनों
में अपनी फंसा बशर है,
इतरा
के ज़मीं पे चलते जो कभी
देख!
उनका हुआ क्या हशर है,
एक
नहीं चलती है इंसान की
होता
जब भी नाज़िल कहर है,
बोझ
है सीने में गुनाहों का
झुकी
इसलिए ही नज़र है,
मिलता
है तुझे वो गले तपाक से
संभल
के, भरा
सीने में ज़हर है,
काँच
के एहसास तेरे ‘इमरान’
याद
रहे! ये पत्थर का शहर है,
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