अक्टूबर 14, 2026

पत्थर का शहर (Patthar ka Shahar) Hindi Ghazal | Hindi Shayari | Zindagi Shayari

 

Ghazal- Patthar ka Shahar by Imran ansari

नदी के किनारे खड़ा मगर है

मर रहा प्यास से वो शजर है,

 

राह तो मंज़िल को सीधी जाती है

उलझनों में अपनी फंसा बशर है,

 

इतरा के ज़मीं पे चलते जो कभी

देख! उनका हुआ क्या हशर है,

 

एक नहीं चलती है इंसान की

होता जब भी नाज़िल कहर है,

 

बोझ है सीने में गुनाहों का

झुकी इसलिए ही नज़र है,

 

मिलता है तुझे वो गले तपाक से

संभल के, भरा सीने में ज़हर है,

 

काँच के एहसास तेरे ‘इमरान’

याद रहे! ये पत्थर का शहर है,


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