जून 04, 2014

कृष्ण


"कृष्ण'' इस पौराणिक चरित्र ने हमेशा से मुझे प्रभावित किया है | कृष्ण के दर्शन में एक जो विरोधाभास है वो वाकई आकर्षण का केंद्र है एक ओर वो जहाँ रासलीला करते नज़र आते हैं तो वही दूसरी ओर गीता के उपदेश देते हुए भी | क्या वाकई जीवन इन विरोधाभासों से घिरा हुआ नहीं है ? और इसी में कमल की भांति खिलता है साक्षी .....दोनों से परे | वैसे तो अपनी इतनी हैसियत नहीं पर फिर भी ये एक छोटा सा प्रयास किया है 'कृष्ण' पर लिखने का | पास-फेल आपके हाथ है | 


साँवला सलोना सा वो 
गोकुल का एक बाँका,
वो तो हो गया उसका
जिसने उसमें झाँका, 

आकर उसके होठों पर 
वेणू भी इतराती, 
फ़िज़ा में एक सुरीली
तान गूँज जाती, 

होठों पर सजाये वो 
एक मंद मुस्कान,
आँखों में लिए मगर 
परम का ज्ञान, 

जहाँ गोपियों संग थे 
उसने खूब रास रचाये,
वहाँ सारथी बन अर्जुन को 
गीता के उपदेश भी सुनाए,

दुनिया को उसने प्रेम के 
देखो कैसे पाठ पढ़ाये,
सत्य के भी जीवन में मगर 
उसने कितने महत्त्व बताये,

डूब इसमें मिलेगा परम भाव 
बड़ा गहरा है कृष्ण का दर्शन, 
निमत्ति मात्र हो तुम यहाँ 
सुख:दुःख सब कर दो अर्पण, 

© इमरान अंसारी

मई 30, 2014

अहसास

दोस्तों,

आप सबको सलाम अर्ज़ करता हूँ और इस बात के लिए माफ़ी का तलबगार हूँ कि एक लम्बे अरसे से ब्लॉगर से गैरहाजिर रहा । कुछ मसरूफियत की वजह से गुज़रे दिनों न ही कुछ लिख पाया और न ही कुछ पढ़ पाया । आइन्दा दिनों में पूरी कोशिश रहेगी कि आप सबके ब्लॉग पर नियमित आना हो और ये निरंतरता बनी रहे | 
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अहसास कहीं हैं खोये हुए
लफ्ज़ मेरे जैसे सोये हुए,
बैठा हूँ कब से इंतज़ार में
मैं हाथ में कलम लिए हुए,

कागज़ पर नक्श बनते हैं 
और बन-बन के बिगड़ते हैं,
लाख सम्भालूँ इन्हें मगर 
फिर भी ज़ेहन से फिसलते हैं,

एक जो तेरा इशारा मिले 
तो फिर कोई ग़ज़ल लिखूँ मैं,
एक जो तेरा सहारा मिले 
तो फिर कोई नज़्म बुनूँ मैं,

© इमरान अंसारी

अप्रैल 14, 2014

दर्द भरी रात



कितनी कराहों 
चीखों में घिरी 
दर्द भरी रात,

भटक रही थी, 
सदियों से मिलन 
को उजाले से,  

स्याह अँधेरे से
दामन बचाती 
डरती दुनिया, 

कहीं सन्नाटे में  
ध्यान में लीन 
जोगी से टकराई, 

पिया दर्द सारा
उसने रात से 
नज़रें मिलाई,

साक्षात्कार के क्षण में 
पड़ा प्रेम का बीज 
उसकी कोख गरमाई,

प्रसव की असीम 
वेदना से गुज़रकर  
नन्हें सूरज को जन्म दे,  

सदियों की भटकन 
से मुक्ति पा 
दर्द की रात गुज़र गई,

© इमरान अंसारी

अप्रैल 04, 2014

मीठा सा इश्क

दोस्तों,

सबसे पहले तो आप सबसे माफ़ी चाहूँगा । पिछले दिनों अति व्यस्तता के चलते स्वयं अपने और आप सभी के ब्लॉग तक आना नहीं हो पाया | सोशल मीडिया कि तस्वीर पिछले कुछ समय से काफी बदल गई है फेसबुक जैसे त्वरित प्रतिक्रिया वाले प्लेटफार्म पर आवाजाही बढ़ी है तो ब्लॉगजगत में कमी आई है । पर इन सबके बावजूद ब्लॉग का अपना नशा है...... जो ठहराव और इत्मीनान से पोस्ट पढ़ कर ईमानदाराना टिप्पणियों से होकर लेखक और पाठक को जोड़ता है । हरसंभव प्रयास रहेगा कि जल्द ही समय निकल कर आप सबके ब्लॉग तक पहुँच सकूँ और कुछ बेहतर और नवीन पढ़ने को मिल सके । आज ये एक छोटी सी नज़्म पेश है आप सबके लिए :-


तेरे तसव्वुर में डूबी
ख़ुमार से भरी आँखे 
कुछ ख्वाब बुनती हैं, 

जिनकी तासीर लबों पर 
चाशनी सी उतरती है,

क़तरा-क़तरा रूह तक 
मीठा सा इश्क बहता है,
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इसके आलावा  'जनसेवा मेल, झाँसी' में पहली बार मेरी कृति को शामिल किया गया है । जिसके लिए दिल से शुक्रिया । अपने लिखे को प्रकाशित हुए देखने की ख़ुशी अलग ही होती है और वो भी पहली बार तो दोस्तों आप सब भी शरीक हो ।


मार्च 13, 2014

लफ्ज़



गुमशुदा से लफ्ज़ 
आते हैं ज़ेहन 
की दहलीज़ तक,

और कुछ देर 
टहलते भी है 
ख्यालों के साथ,

कागज़ पर उन्हें 
बाँधने की कोशिश में 
हाथ से फिसलते हैं,

मेरी ही तरह 
शायद लफ्ज़ भी 
बंधन से कतराते हैं,

© इमरान अंसारी