आ !
नंगे पैर रेत पर चलें
खुशबू
से हवाओं में घुलें,
बाँसुरी
की तान पर झूमें
आहिस्ता
से फूलों को चूमें,
दरिया
में पैरों को झुलायें
बादलों
में तस्वीरें बनाएं,
आँगन
में पौधे उगाएँ,
मिट्टी
के घरौंदे बनाएँ
पेड़
की डालों पर लटकें
धूप
में तितलियाँ पकड़ें,
भुला
दें सारे शिकवे-गिले
दोस्त
बनें, चल
गले मिलें,
आँखों
में कुछ ख्वाब बुनें
चल
फिर से इंसान बनें,
आ !
नंगे पैर रेत पर चलें
खुशबू
से हवाओं में घुलें,

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें
आपकी अमूल्य राय, सलाह और आलोचना का स्वागत है।