सितंबर 09, 2013

बचपन



जिंदगी का वो हसीं दौर लौटा दे 
ए ! वक़्त मुझे मेरा बचपन लौटा दे……

जब माँ के आँचल में छुप जाता था
जब न किसी गम से मेरा नाता था,

जिंदगी का वो हसीं दौर लौटा दे 
ए ! वक़्त मुझे मेरा बचपन लौटा दे……

जब आगे निकल जाने की होड़ न थी 
जब दुनिया की ये पागल दौड़ न थी,

जिंदगी का वो हसीं दौर लौटा दे 
ए ! वक़्त मुझे मेरा बचपन लौटा दे……

जब पल में रूठना और पल में मनाना था 
जब दोस्ती का खुबसूरत वो ज़माना था, 

जिंदगी का वो हसीं दौर लौटा दे 
ए ! वक़्त मुझे मेरा बचपन लौटा दे………

जब मोहल्ले से आती शिकायतें थी 
जब हुआ करती मासूम शरारतें थी, 

जिंदगी का वो हसीं दौर लौटा दे 
ए ! वक़्त मुझे मेरा बचपन लौटा दे……

जब तोड़ते पेड़ों से बेर, अमरुद और आम थे 
जब रखते एक दूसरे के कैसे-कैसे नाम थे, 

जिंदगी का वो हसीं दौर लौटा दे 
ए ! वक़्त मुझे मेरा बचपन लौटा दे……

जब धूप, बारिश, आँधी सब झेला करते थे 
जब सुबह से शाम तक बस खेला करते थे, 

जिंदगी का वो हसीं दौर लौटा दे 
ए ! वक़्त मुझे मेरा बचपन लौटा दे……

25 टिप्‍पणियां:

  1. जब धूप बारिश आंधी सब झेला करते थे
    जब सुबह से शाम तक बस खेला करते थे.....!!!
    पढ़ते-पढ़ते बचपन के बीते दिन याद आने लगे...बहुत सुंदर रचना..
    अब तो बच्चों का जैसे बचपन ही ख़त्म हो गया है लगता है...

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    1. शुक्रिया अदिति जी। ....सही कहा आपने अब तो बच्चों पर इतना बोझ डाल दिया गया है कि बचपन कहीं उसके नीचे दब गया है |

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  2. बचपन की शरारतों से भरी खुबसूरत रचना !!
    सच बचपन के वो दिन अब सिर्फ ख्वाबों में.… काश ! इसे लौटाया जा सकता .......

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  3. बचपन -- यादों में ही सही बार-बार सुखद अहसास बिखेर कर हमारे वजूद को सहला जाता है.. उम्दा ..

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  4. रचना सक्षम है बचपन की उन गलियों में वापस लौटाने के लिए जहां की यादें हमेशा बसी रहती हैं दिल में ... वो सुख के पल हमेशा साथ रहते हैं ... बहुत ही उम्दा ...

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  5. जब धूप, बारिश, आँधी सब झेला करते थे
    जब सुबह से शाम तक बस खेला करते थे,

    वाह क्या बात है !!!बहुत ही सुंदर अभिव्यक्ति,,
    गणेश चतुर्थी की हार्दिक शुभकामनाए !

    RECENT POST : समझ में आया बापू .

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  6. बचपन हर कोई लौटा लाना चाहता है पर ये कहाँ मुमकिन है .... सुंदर निश्छल भाव

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  7. ummId hai aap ko bansoi kaa arth samjh aa gayaa hogaa.
    Vinnie,
    Please visit my blog--Unwarat.com

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  8. बचपन के दिन भी क्या दिन थे...सुंदर भावमाला...

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  9. बहुत ही मासूम इल्तिजा ...कोई भला कैसे ठुकरा सकता है

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  10. सुंदर रचना...
    आप की ये रचना आने वाले शुकरवार यानी 13 सितंबर 2013 को नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही है... ताकि आप की ये रचना अधिक से अधिक लोग पढ़ें...
    आप भी इस हलचल में सादर आमंत्रित है... आप इस हलचल में शामिल अन्य रचनाओं पर भी अपनी दृष्टि डालें...इस संदर्भ में आप के सुझावों का स्वागत है...


    आप सब की कविताएं कविता मंच पर आमंत्रित है।
    हम आज भूल रहे हैं अपनी संस्कृति सभ्यता व अपना गौरवमयी इतिहास आप ही लिखिये हमारा अतीत के माध्यम से। ध्यान रहे रचना में किसी धर्म पर कटाक्ष नही होना चाहिये।
    इस के लिये आप को मात्रkuldeepsingpinku@gmail.com पर मिल भेजकर निमंत्रण लिंक प्राप्त करना है।



    मन का मंथन [मेरे विचारों का दर्पण]

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    1. हमारे ब्लॉग की पोस्ट को यहाँ शामिल करने का तहेदिल से शुक्रिया |

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  11. ए काश कि ऐसा हो पाता....
    हम लौट के फिर से जा सकते...
    उस मोड़...गली...चौराहे पर....
    जब हाथ पकड़ कर दौड़े थे...
    कुछ दूर गए...फिर बैठ गए...
    हम-तुम...तुम-हम....

    खूबसूरत.....

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  12. बहुत बढ़िया लिखा है इमरान भाई आपने. सच तो यही है कि जीवन के हर बढ़ते साल के साथ जटिलताएं और भी बढती जाती है. सब कुछ अगर मिल जाता है तो जीवन की उन्मुक्तता कभी फिर से मिल नहीं पाती है. ऐसे में बचपन की कल्पना मात्र ही सुखद ऐसे दे जाता है. अति उत्तम.

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  13. इमरान जी .. आपने तो हर दिल की तमन्ना को अपने शब्द दे दिए ... बेहतरीन रचना !

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  14. काश। ...... ऐसा होता...... इस भाव को गढ़ने के लिए धन्यवाद

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  15. दोबारा बचपन की जीने की इच्छा सबको होती है --हार्दिक शुभकामनायें
    latest post गुरु वन्दना (रुबाइयाँ)

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  16. आप सभी लोगों का तहेदिल से शुक्रिया हौसलाफजाई करने का |

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  17. एक बचपन का जमाना था, जिस में खुशियों का खजाना था..चाहत चाँद को पाने की थी, पर दिल तितली का दिवाना था..खबर ना थी कुछ सुबहा की, ना शाम का ठिकाना था..थक कर आना स्कूल से, पर खेलने भी जाना था..माँ की कहानी थी, परीयों का फसाना था..बारीश में कागज की नाव थी, हर मौसम सुहाना था..हर खेल में साथी थे, हर रिश्ता निभाना था..गम की जुबान ना होती थी, ना जख्मों का पैमाना था..रोने की वजह ना थी, ना हँसने का बहाना था..क्युँ हो गऐे हम इतने बडे, इससे अच्छा तो वो बचपन का जमाना था

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  18. पंडित : गंगाशरण गौतममार्च 31, 2015

    माना बचपन अच्छा था पर इतना भी अच्छा ना था। माँ पिता टीचर बड़ा भाई । फर्ज़ का कर्ज़ चुकाना था । आज्ञान अंधेरा ज्यादा था । आगे भी मुझको जाना था । कदम कदम पर हिलकी आती । बड़ा ही कठिन जमाना था ॥

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  19. बहुत ही सुंदर रचना.. पढ़कर मैं भी अपने बचपन में लौट आया हूँ.. 💁

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  20. संदीप ठाकरे, बुरहानपुरजून 17, 2016

    इस रचना पर तहे-दिल से शुक्रिया ।

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  21. संदीप ठाकरे, बुरहानपुरजून 17, 2016

    Thank You so much for this wonderful creation .....

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जो दे उसका भी भला....जो न दे उसका भी भला...