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फ़रवरी 01, 2014

चल यार मनाएंगे


मिसरा एक सूफी कव्वाली का  'चल यार मनाएं' सुना था कहीं । उसके गिर्द एक सूफियाना क़लाम बुना है, इसमें सिर्फ इस एक मिसरे के सिवा बाकि सब इस 'इमरान' ने ही कहा है | यहाँ 'यार' 'गुरु' को कहा गया है, इसे ख्याल में रखें और सब कुछ भूल कर कुछ देर को डूब जाएँ इस समंदर में |
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चल री सखी ! चल यार मनाएंगे

जिसके रंग में रंगे हम जोगी 
साथ उसके ही रास रचाएंगे, 

चल री सखी ! चल यार मनाएंगे

नज़रों ने किया घायल जिसकी  
उसको ही हम दिलदार बनाएंगे, 

चल री सखी ! चल यार मनाएंगे

आई है जिससे ज़िंदगी में बहार
    वफ़ा का उसको हार पहनाएंगे,  

चल री सखी ! चल यार मनाएंगे

छुपाने से कहीं खो न जाएँ ख़ज़ाने 
पाई दौलत दोनों हाथों से लुटाएंगे, 

चल री सखी ! चल यार मनाएंगे

जहाँ खोजी ख़ुशी वहाँ मिले गम 
 अब न यूँ बाकि उमर गवाएंगे, 

चल री सखी ! चल यार मनाएंगे

ख़ाली झोली कुछ नहीं अपने पल्ले 
रोज़ फ़क़ीर मगर त्योहार मनाएंगे, 

चल री सखी ! चल यार मनाएंगे

खुद भी जिसमें होश बाकि  न रहे 
करके ऐसा रक़्स उसको रिझाएंगे, 

चल री सखी ! चल यार मनाएंगे

दिसंबर 07, 2013

अहसास-ए-तन्हाई



कोहरे से घिरी सर्द रातों में अक्सर 
यूँ भी घर से निकलता हूँ ये सोचकर 
कि मेरी ही तरह चाँद को भी 
अहसास-ए-तन्हाई सताती होगी,

ठिठुरती हुई इन गलियों में 
आवारा चाँदनी भटकती होगी,
गर्म दुशाले में लिपटी वो कहीं 
अलाव से हाथों को सेकती
मेरी याद में तड़पती होगी,

अहसासों की गर्म तपिश के सहारे 
साँसों के गर्म उजले धुएँ की रौशनी में, 
धुंध को चीरता मैं चला जाता हूँ 
एक सिर्फ तेरी ही तलाश में, 

दूर कहीं कुछ साये से लहराते हैं  
दामन का तेरे अहसास कराते है, 
कहीं कोई दीप झिलमिलाता है 
मिलन की एक आस जगाता है,

कहीं कुछ नज़र नहीं आता 
अपने ही क़दमों कि आवाज़ें हैं, 
इस सिरे से उस सिरे तक सिर्फ
सफ़ेद कोहरे कि परवाज़ें हैं,

मेरी ही तरह ये चाँद भी जलता है 
कैसा मेरा और इसका रिश्ता है,
रजाइयों में दुबक जब सोता है जहाँ 
आशिक़ पिया मिलन को तरसता है,

कोहरे से घिरी सर्द रातों में अक्सर 
यूँ भी घर से निकलता हूँ ये सोचकर 
कि मेरी ही तरह चाँद को भी 
अहसास-ए-तन्हाई सताती होगी,

© इमरान अंसारी

जुलाई 16, 2013

आज

मैं डरा-डरा सहमा सा 
शाम के धुंधलके में......... 

जैसे ही अपने 'आज' को 
पोटली में समेटकर 
चार कोस आगे आने वाले
'कल' की ओर लेकर चलता हूँ,
कि तभी अतीत के अँधेरे से 
निकलने वाले काले साए  
मुझे चारों तरफ से घेर लेते हैं,
और मुझ पर जानलेवा हमला करके 
मेरी पोटली से वो मेरा 'आज' चुराकर
फिर से अतीत के अंधेरों में ग़ुम हो जाते हैं, 

हर रोज़ ही ये कहानी 
खुद को दोहराती है.......
बड़ी मशक्कत से मैं रोज़ 
एक नया 'आज' कमाता हूँ 
और रोज़ ही अतीत के वो काले साए 
मुझसे मेरा आज छीन के ले जाते हैं,
और मैं रोज़ मिलने वाले ज़ख्मों 
को भर कर फिर से निकलता हूँ
जिंदगी कि सख्त राहों पर,

इस उम्मीद में कि कभी न कभी मैं 
अतीत के सायों से अपने 'आज' को 
महफूज़ बचाकर चार कोस पर 
आने वाले 'कल' तक ले जाउँगा
क्योंकि कहते हैं वहाँ जो सूरज 
एक बार निकलता है 
वो फिर कभी नहीं डूबता  
उस के उजाले में अतीत के 
काले सायों से सदा के लिए 
छुटकारा मिल जाता है,  

मैं डरा-डरा सहमा सा 
शाम के धुंधलके में..............

फ़रवरी 20, 2013

अब के बहार



अब के बहार चुनर मोरी रंग दे......

तूने बख्शी तो दी मुझको ये कोरी 
मौला ! हो गई चुनर मोरी मैली, 

अब के बहार चुनर मोरी रंग दे...... 

दिखते रहे मुझे हर तरफ सब्ज़बाग़ 
साथ लगते रहे मोरी चुनरी में दाग, 

अब के बहार चुनर मोरी रंग दे...... 

हो मोरी चुनर में रंग हरा, पीला और लाल 
कितना बेचैन हूँ मैं, तू ही जाने मेरा हाल, 

अब के बहार चुनर मोरी रंग दे.......

रंगरेज़ मेरे ऐसे रंगियो कि रंग नहीं छूटे 
तुझसे लगी अब मेरी ये लौ नहीं छूटे, 

अब के बहार चुनर मोरी रंग दे.......

कर मुझ पर मेरे रंगरेज़ इतना सा अहसान 
तेरा था, तेरा है और तेरा रहेगा ये 'इमरान'

अब के बहार चुनर मोरी रंग दे.......

जनवरी 23, 2013

सफ़र



जितना पास गया मैं उतनी ही दूरी बढ़ती रही 
जिंदगी सिवाय सफ़र के और कुछ भी नहीं,

न रखना कभी किसी से कुछ पाने की उम्मीद 
लेना जानते हैं लोग यहाँ, देने को कुछ भी नहीं, 

उमर बिता दी जिसने जीतने में दुनिया सारी
क्या लेकर गया सिकंदर यहाँ से कुछ भी नहीं,

मैं कैसे दावा कर दूँ मसीहाई का ए ! दोस्त  
खुद मेरे दामन में दर्द के सिवा कुछ भी नहीं, 

ले अपने आगोश में कर मुझको फ़ना मेरे ख़ुदा 
बाकी बचे मेरा अब मुझमे निशां कुछ भी नहीं,

क्यूँ किसी हुस्न-ए-बुतां में ढूँढते हो तुम उसे 'इमरान'
हर ज़र्रे में नुमाया है वो उसके सिवा और कुछ भी नहीं,


अक्टूबर 23, 2012

मैं क्या हूँ ?


प्रिय ब्लॉगर साथियों, 

24.10.2012 को अपनी 28वीं सालगिरह के मौके पर इस खुबसूरत दुनिया में अपनी जिंदगी का एक और साल बिताने पर खुदा का शुक्रगुज़ार हूँ......पिछले एक साल में जिंदगी ने बहुत कुछ सिखाया......बहुत कुछ खोया, बहुत कुछ पाया.....खैर ये क्रम तो चलता ही रहता है मायने ये रखता है की हमने क्या सीखा?.......इस पोस्ट के माध्यम से आप सभी दोस्तों का दिल से शुक्रगुज़ार हूँ जो अपना कीमती वक़्त इस ब्लॉग को देते हैं और हौसलाफजाई करते है........दोस्तों मेरे हक में दुआ करें की खुदा मुझे नेक राह पर चलने की तौफिक दे.....आमीन। तो पेश-ए-खिदमत है इस मौके पर ये एक नज़्म.....कोई कमीबेशी हो तो ज़रूर बताएं -


मैं क्या हूँ ?
कुछ भी तो नहीं...... 

सिवाय ज़मीन पर पड़ी 
उस खाक के, 
जिसका ज़र्रा ज़र्रा 
आफ़ताब कि रौशनी 
का मोहताज है.......

मैं क्या हूँ ?
कुछ भी तो नहीं..... 

सिवाय उस बहते 
दरिया के जो,
कभी किसी रोज़ 
सागर में मिलने 
को बेताब है........

मैं क्या हूँ ?
कुछ भी तो नहीं..... 

सिवाय उस अलमस्त 
फकीर के जिसके 
पाँवों में काँटे हैं 
और लबो पर खुदा से 
मिलन कि आस है.....

मैं क्या हूँ ?
कुछ भी तो नहीं...... 

सिवाय आसमां के उस 
तारे के जो खुद भी चमकने 
को महताब कि रोशनी 
का मोहताज है......

मैं क्या हूँ ?
कुछ भी तो नहीं.....

सिवाय उस हिना के
जो खुद को मिटा के 
बनती महबूब के हाथों 
     की ज़ीनत-ओ-आब है....

मैं क्या हूँ ?
कुछ भी तो नहीं...... 

सिवाय उस गुलाम के
जिसका सर झुकता है
उसके आगे जो,
       सारे जहाँ का सरताज है...... 

मैं क्या हूँ ?
कुछ भी तो नहीं...... 
  

सितंबर 27, 2012

जोगी



जबसे देखी है झलक मैंने तेरी
बन गया हूँ तब से मैं तेरा जोगी,

तेरे रहम का हूँ तलबगार कबसे
बख्श देगा तो रहमत तेरी होगी,

पा लूँगा जब खुद में तेरा वजूद
हाथों में तब क़ायनात सारी होगी  

लगा है जबसे ये इश्क़ वाला रोग
बीमार हूँ तेरा, दुनिया कहे रोगी,

कैसे झेलूँगा तेरे जलवों की ताब
जब तुझसे मुलाक़ात मेरी होगी,

झुका दी है अब तेरे क़दमों में ख़ुदी 
कभी तो बारिश तेरे नूर की होगी,  

नहीं भटकोगे तुम कभी रास्ता
    साथ तुम्हारे उसकी रहनुमाई होगी,  

सितंबर 19, 2012

परवाज़



खुले हों जो पँख परिंदे के तो परवाज़ कहाँ रूकती है 
पर हम खुद को पिंजरों में गिरफ्तार किये बैठे हैं,

वो राह तो सीधी ही मंजिल तक चली जाती है 
पर हम अपने ही बुने जालों में फँसे बैठे हैं,

चढ़ी थी जहाँ हमारी मुहब्बत की दास्ताँ परवान 
उन्ही राहों को आज भी राहगुज़र बनाये बैठे हैं,

जब तक बुझ नहीं जाती प्यास हमारी रूह की 
तब तक हम अलख जगाये तेरे दरबार में बैठे हैं,

बख्श देगा, ए ! मेरे मौला मेरे गुनाहों को तू 
इसी उम्मीद पे तेरे दर पे सर झुकाए बैठे हैं,

देगा एक दिन तू अपने जलवों का नज़ारा मुझे 
बस इसी एक दुआ को हम हाथ उठाये बैठे हैं,

दिसंबर 13, 2011

कुन फाया कुन


आज एक बहुत ही प्यारा गीत फिल्म 'रॉक स्टार' से जिसे 'इरशाद कामिल' ने लिखा है  'जावेद अली' ने गाया है और 'रहमान' ने इसमें अपने संगीत से जादू भर दिया है.......रूह को सुकून देने वाला ये रूहानी सूफी गीत मुझे बहुत पसंद आया.......दिल हुआ आपसे बाँटने का | ये आज पहली बार है जब मैंने किसी फिल्म के गीत को चुना है पर मैं रोक नहीं पाया खुद को क्योंकि मुझे ये बहुत पसंद आया.......सलाम है इसके बनने में जुड़ने वाले सभी लोगों को|

'कुन फाया कुन' कुरान शरीफ की एक आयत 'यासीन शरीफ' से लिया गया है जिसका मतलब है जब दुनिया में कुछ नहीं था तो खुदा ने दुनिया से कहा हो जा और वो हो गयी यानि जब कुछ नहीं था तब भी खुदा था और जब कुछ नहीं होगा तब भी खुदा होगा........या मौला हमे नेकी की राह पर चलने की तौफिक दे.......आमीन|
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कदम बढ़ा ले हदों को मिटा ले
आजा खाली पल में पी (पिया) का घर तेरा
तेरे बिन खाली  आ जा खालीपन में

कुन फाया कुन फाया कुन

जब कहीं पे भी नहीं था
वही था, वही था

वो जो मुझमें समाया 
वो जो तुझमें समाया
मौला वही-वही माया

रंगरेज़ा रंग मेरा तन मेरा मन
ले ले रंगाई चाहे तन चाहे मन

सजरा सवेरा मेरे तन बरसे
कजरा अँधेरा तेरी जलती लौ
कतरा मिला जो तेरे दर बरसे

मुझपे करम सरकार तेरा अरज तुझे 
कर दे मुझे मुझसे ही रिहा
अब मुझको भी हो दीदार मेरा
कर दे मुझे मुझसे ही रिहा


मन के मेरे ये भरम 
कच्चे मेरे ये करम
लेके चले हैं कहाँ 
मैं तो जानूँ ही ना

तू है मुझमें समाया 
कहाँ लेके मुझे आया
मैं हूँ तुझमें समाया 
तेरे पीछे चला आया

तेरा ही मैं एक साया 
तूने मुझको बनाया 
मैं तो जग को न भाया 
तूने गले से लगाया

हक तू ही है खुदाया
सच तू ही है खुदाया
कुन फाया कुन फाया कुन