मिसरा एक सूफी कव्वाली का 'चल यार मनाएं' सुना था कहीं । उसके गिर्द एक सूफियाना क़लाम बुना है, इसमें सिर्फ इस एक मिसरे के सिवा बाकि सब इस 'इमरान' ने ही कहा है | यहाँ 'यार' 'गुरु' को कहा गया है, इसे ख्याल में रखें और सब कुछ भूल कर कुछ देर को डूब जाएँ इस समंदर में |
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चल री सखी ! चल यार मनाएंगे
जिसके रंग में रंगे हम जोगी
साथ उसके ही रास रचाएंगे,
चल री सखी ! चल यार मनाएंगे
नज़रों ने किया घायल जिसकी
उसको ही हम दिलदार बनाएंगे,
चल री सखी ! चल यार मनाएंगे
आई है जिससे ज़िंदगी में बहार
वफ़ा का उसको हार पहनाएंगे,
चल री सखी ! चल यार मनाएंगे
छुपाने से कहीं खो न जाएँ ख़ज़ाने
पाई दौलत दोनों हाथों से लुटाएंगे,
चल री सखी ! चल यार मनाएंगे
जहाँ खोजी ख़ुशी वहाँ मिले गम
अब न यूँ बाकि उमर गवाएंगे,
चल री सखी ! चल यार मनाएंगे
ख़ाली झोली कुछ नहीं अपने पल्ले
रोज़ फ़क़ीर मगर त्योहार मनाएंगे,
चल री सखी ! चल यार मनाएंगे
खुद भी जिसमें होश बाकि न रहे
करके ऐसा रक़्स उसको रिझाएंगे,
चल री सखी ! चल यार मनाएंगे


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