सितंबर 19, 2012

परवाज़



खुले हों जो पँख परिंदे के तो परवाज़ कहाँ रूकती है 
पर हम खुद को पिंजरों में गिरफ्तार किये बैठे हैं,

वो राह तो सीधी ही मंजिल तक चली जाती है 
पर हम अपने ही बुने जालों में फँसे बैठे हैं,

चढ़ी थी जहाँ हमारी मुहब्बत की दास्ताँ परवान 
उन्ही राहों को आज भी राहगुज़र बनाये बैठे हैं,

जब तक बुझ नहीं जाती प्यास हमारी रूह की 
तब तक हम अलख जगाये तेरे दरबार में बैठे हैं,

बख्श देगा, ए ! मेरे मौला मेरे गुनाहों को तू 
इसी उम्मीद पे तेरे दर पे सर झुकाए बैठे हैं,

देगा एक दिन तू अपने जलवों का नज़ारा मुझे 
बस इसी एक दुआ को हम हाथ उठाये बैठे हैं,

39 टिप्‍पणियां:

  1. बख्श देगा, ए ! मेरे मौला मेरे गुनाहों को तू
    इसी उम्मीद पे तेरे दर पे सर झुकाए बैठे हैं,,,,,,बहुत खूब इमरान जी,,,

    RECENT P0ST ,,,,, फिर मिलने का

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    1. बहुत बहुत शुक्रिया धीरेन्द्र जी।

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  2. सर झुकाकर तूने
    खुद को खुद किया है माफ़
    तेरी हर दुआ कबूल
    तेरे पास ही हूँ मैं ...

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    1. बहुत खूब रश्मि जी.....शुक्रिया आपका।

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  3. आपकी यह बेहतरीन रचना शनिवार 22/09/2012 को http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जाएगी. कृपया अवलोकन करे एवं आपके सुझावों को अंकित करें, लिंक में आपका स्वागत है . धन्यवाद!

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    1. शुक्रिया यशोदा दी हलचल में हमारी पोस्ट शामिल करने का।

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  4. बहुत खूब! सदैव की तरह लाज़वाब गज़ल...

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  5. वो राह तो सीधी ही मंजिल तक चली जाती है

    पर हम अपने ही बुने जालों में फँसे बैठे हैं,

    Bahut Umda...

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    1. बहुत बहुत शुक्रिया मोनिका जी ।

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  6. उम्दा पंक्तियाँ ..
    रहमत जब खुदा की हो तो बंजर भी चमन होता..
    खुशिया रहती दामन में और जीवन में अमन होता...
    मर्जी बिन खुदा यारो तो जर्रा भी नहीं हिलता
    खुदा जो रूठ जाये तो मय्यसर न कफ़न होता

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    1. वाह बहुत खूब....इतने सुन्दर शब्दों में टिप्पणी का आभार मदन जी ।

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  7. वाह वाह शानदार प्रस्तुति है ………बहुत खूब

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  8. वाह ! दिल से निकली हर दुआ सीधी वहीं पहुंच जाती है..पर जब पता चल जाये कि परवाज हो सकती है तो खुद को पिंजरों से मुक्त करना ही होगा..बल्कि हम हैं हीं मुक्त..इसका बोध मात्र ही करना है, बहुत सुंदर रचना !

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    1. बहुत बहुत शुक्रिया अनीता जी....आपको पसंद आई मेहनत सफल हुई :-)

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  9. सभी शेर लाजवाब ... बख्श देगा ... ये शेर जैसे दिल से निकली चाह है ...
    बहुत उमड़ा गज़ल ...

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    1. बहुत बहुत शुक्रिया दिगंबर जी ।

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  10. बहुत ही बेहतरीन
    शानदार गजल..
    :-)

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  11. एक उम्मीद ही तो है ..जिस पर सारी कायनात टिकी बैठी है ...सुन्दर ग़ज़ल

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  12. बेहतरीन .... हमेशा की तरह ..हरेक शेर पर दाद देने का जी चाहता है|

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    1. बहुत बहुत शुक्रिया शालिनी जी।

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  13. इस रचना के भाव अच्छे लगे।

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  14. आप सभी लोगों का बहुत बहुत शुक्रिया अपनी अमूल्य टिप्पणी देने का ।

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  15. बेहतरीन रचना..बहुत ही उम्दा भाव..

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  16. वाह ... बेहतरीन भाव लिए उम्‍दा प्रस्‍तुति

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    1. बहुत बहुत शुक्रिया सदा जी।

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    2. बख्श देगा, ए ! मेरे मौला मेरे गुनाहों को तू
      इसी उम्मीद पे तेरे दर पे सर झुकाए बैठे हैं,

      kuch or swal liye meri new post

      KYUN???

      https://udaari.blogspot.in

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जो दे उसका भी भला....जो न दे उसका भी भला...