नवंबर 08, 2012

काफ़िला



मेरे देखते देखते ही गुज़र गया मेरा काफ़िला
मैं बिछड़ कर उससे फिर सफ़र में रह न सका,  

कहती थी दुनिया जिस दौलत को जहाँ का हासिल 
उसे पाने को मैं किसी गरीब का गला काट न सका, 

तोड़ते रहे लोग हमेशा मेरे दिल को आईने की तरह
मगर चाहकर भी किसी का बुरा मुझसे हो न सका, 

माना उसने दिया मुझे हज़ार बार राह में फरेब 
पर किसी और को भी तो महबूब मैं कह न सका,    

मिलती रही मुझे सज़ा यकीनन उम्र भर, क्योंकि 
किसी और पर होते ज़ुल्म को मैं सह न सका, 

उम्र-ए-गुरेज़ाँ से मेरी कभी न बन सकी 'इमरान'
इसने जो भी माँगा था मुझसे, वो मैं दे न सका,


39 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत उम्दा रचना. आभार.

    उत्तर देंहटाएं
  2. वाह.....

    उम्र-ए-गुरेजाँ से मेरी कभी न बन सकी इमरान !
    इसने जो भी माँगा था मुझसे,वो मैं दे न सका......!!

    वो क्या मांग रहा था बिना सोचे दे देना था भाई !
    दे ही देते....तो सारे झगड़े ही खत्म हो जाते...!

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. बहुत बहुत शुक्रिया दी......हाँ आखिर में तो देना ही पड़ता है....दे ही डाला :-)

      हटाएं
  3. बहुत खूबसूरत ज़ज्बात.....
    तेरे भी.....!
    मेरे भी.....!!

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत सुंदर जज़्बात ...
    शुभकामनायें ...

    उत्तर देंहटाएं
  5. लोग तोड़ते रहे मेरे दिल को आईने की तरह
    मगर चाह कर भी मुझसे किसी का बुरा हो न सका ...............बहुत उम्दा ..........बहुत अच्छा लिखते हो इमरान हमेशा खुश रहो .........

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. ये आपकी ज़र्रानवाज़ी है बहुत शुक्रिया प्रतिभा जी ।

      हटाएं
  6. वाह,,,,खूबशूरती से आपने जज्बातों को पेश करने के लिये बधाई,,,,,

    चलो अच्छा हुआ अपनों में कोई गैर तो निकला,
    अगर होते सभी अपने तो बेगाने कहाँ जाते,,,,,,,( शकील बदायूनी )

    RECENT POST:..........सागर

    उत्तर देंहटाएं
  7. वाह... क्या बात है इमरान जी.... जज्बातों को गज़ल में पिरोना कोई आपसे सीखे..बहुत उम्दा!

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. शुक्रिया शालिनी जी....ये ज़र्रानवाज़ी है आपकी ।

      हटाएं
  8. आपका इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार (10-11-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. शुक्रिया वंदना जी....चर्चा मंच पर हमारी पोस्ट के लिए.....दूसरी पारी की शरुआत अच्छी रही.....दीपावली की हार्दिक शुभकामनायें।

      हटाएं
  9. तोड़ते रहे लोग हमेशा मेरे दिल को आईने की तरह

    मगर चाहकर भी किसी का बुरा मुझसे हो न सका,

    Bahut Badhiya.....

    उत्तर देंहटाएं
  10. बहुत अच्छा लिखते हो... जज्बातों का काफ़िला दिल से दिल तक...

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. शुक्रिया संध्या जी....ये ज़र्रानवाज़ी है आपकी ।

      हटाएं
  11. बहुत सुन्दर रचना ....मन गलत राह में चलने की इजाजत दे न सका ....

    उत्तर देंहटाएं
  12. माना उसने दिया मुझे हज़ार बार राह में फरेब
    पर किसी और को भी तो महबूब मैं कह न सका ..
    यही तो सच्ची मोहब्बत है .. या कहें कि इबादत है ..
    बेहद खूबसूरत ग़ज़ल ..

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. बहुत बहुत शुक्रिया मधुरेश जी ।

      हटाएं
  13. माना उसने दिया मुझे हज़ार बार राह में फरेब
    पर किसी और को भी तो महबूब मैं कह न सका,

    रूह की यारी एक से ही हो सकती है!!
    फिर कितने भी फरेब मिले,
    यारी की है तो अपना तो निभाना ही है !!

    दिवाली की शुभकामनाएं !!!

    उत्तर देंहटाएं
  14. ईमानदारी,सुख भले न दे सके,अपने मन में अपना सम्मान बरकरार रखती है .

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. सही कहा आपने ....... शुक्रिया प्रतिभा जी ।

      हटाएं
  15. उसने दिया फ़रेब ... मैं न भुला सका ,
    बहुत बढ़िया

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. बहुत बहुत शुक्रिया रश्मि जी।

      हटाएं
  16. बहुत खूबसूरती से पेश किए गए जज्बातों के लिए ... बधाई!

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. शुक्रिया शालिनी जी....ये ज़र्रानवाज़ी है आपकी ।

      हटाएं
  17. वाह! कमाल..लाजवाब..बेहतरीन नज़्म..दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं..

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. बहुत बहुत शुक्रिया अमृता जी.....आपको भी दीपावली की हार्दिक शुभकामनायें।

      हटाएं
  18. लाज़वाब गज़ल...आपको सपरिवार दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं!

    उत्तर देंहटाएं

जो दे उसका भी भला....जो न दे उसका भी भला...