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जुलाई 01, 2014

दुःख



हाँ, दुखी हूँ मैं 
करता हूँ इसे स्वीकार 
किया सुख को अंगीकार 
तो इसे कैसे करूँ इंकार 

उदासी की काली चादर 
ढक लेती जब मन को,
विषाद के घनीभूत क्षण 
कचोटते है तब मन को,

निकल भागने को बेचैन 
हो उठता व्याकुल मन,
स्वयं को ही शत्रु मान
आत्मघात को आतुर मन, 

मेरा ये दुःख भी तो 
सुख की ही उत्पत्ति है 
क्या पलायन करने में 
दुःख की निष्पत्ति है ?

जितना है जो संवेदनशील 
होता उसे दुःख का संज्ञान 
जड़ है जो, नहीं होता उसे 
जीवन में दुःख का भान,

दुःख को जीना ही होगा 
यदि इसके पार जाना है,
काँटों पर चलना ही होगा 
यदि विश्राम को पाना है ,

हाँ, दुखी हूँ मैं 
करता हूँ इसे स्वीकार 
किया सुख को अंगीकार 
तो इसे कैसे करूँ इंकार 

© इमरान अंसारी 


जून 25, 2014

किनारा


न तो इस किनारे ही जीवन है 
और न ही उस किनारे पर 
अरसे से रुके हुए थमे हुए ये 
किनारे कभी कहीं नहीं पहुँचते,

दोनों ही किनारों के बीच रहकर 
नदी के प्रवाह सा बहता है जीवन 
जैसे साक्षी भाव बहता है भीतर 
सुख और दुःख दोनों से परे 

बैठ पकड़ कोई भी किनारा 
बस सड़ता जाता है जीवन 
बहता हुआ स्वीकृति के भाव से 
एक रोज़ जा मिलता है सागर में ,

© इमरान अंसारी 

जून 04, 2014

कृष्ण


"कृष्ण'' इस पौराणिक चरित्र ने हमेशा से मुझे प्रभावित किया है | कृष्ण के दर्शन में एक जो विरोधाभास है वो वाकई आकर्षण का केंद्र है एक ओर वो जहाँ रासलीला करते नज़र आते हैं तो वही दूसरी ओर गीता के उपदेश देते हुए भी | क्या वाकई जीवन इन विरोधाभासों से घिरा हुआ नहीं है ? और इसी में कमल की भांति खिलता है साक्षी .....दोनों से परे | वैसे तो अपनी इतनी हैसियत नहीं पर फिर भी ये एक छोटा सा प्रयास किया है 'कृष्ण' पर लिखने का | पास-फेल आपके हाथ है | 


साँवला सलोना सा वो 
गोकुल का एक बाँका,
वो तो हो गया उसका
जिसने उसमें झाँका, 

आकर उसके होठों पर 
वेणू भी इतराती, 
फ़िज़ा में एक सुरीली
तान गूँज जाती, 

होठों पर सजाये वो 
एक मंद मुस्कान,
आँखों में लिए मगर 
परम का ज्ञान, 

जहाँ गोपियों संग थे 
उसने खूब रास रचाये,
वहाँ सारथी बन अर्जुन को 
गीता के उपदेश भी सुनाए,

दुनिया को उसने प्रेम के 
देखो कैसे पाठ पढ़ाये,
सत्य के भी जीवन में मगर 
उसने कितने महत्त्व बताये,

डूब इसमें मिलेगा परम भाव 
बड़ा गहरा है कृष्ण का दर्शन, 
निमत्ति मात्र हो तुम यहाँ 
सुख:दुःख सब कर दो अर्पण, 

© इमरान अंसारी

फ़रवरी 12, 2014

प्यार और प्यार

दोस्तों,

आप सभी का शुक्रिया जो 'चल यार मनाएंगे' आपको पसंद आई । कुछ लोगों ने कहा और खुद मुझे भी लगा कि इसे धुन में पिरो कर गुनगुनाने लायक बनाना चाहिए । तो एक छोटा सा प्रयास किया जिसे आप यहाँ (विडियो यू ट्यूब पर ) देख सकते है |
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फरवरी का गुलाबी मौसम
फिजाओं में महकती फूलों की खुशबू  
तन-मन को गुदगुदाती बसंती बयार  
हर तरफ फैला हुआ एक खुमार
कुछ और नहीं बस प्यार और प्यार,

अनगिनत परिभाषाएं,असंख्य अभिव्यक्तियाँ
फिर भी अनकहा सा,  अनसुलझा सा 
सिर्फ मेरे और तुम्हारे अनुभव पर आधारित 
कहाँ बाँध सका कोई इसे शब्दों में 
कहाँ कह सका कोई इसे जुबां से
दिल से दिल तक बंधा एक तार 
कुछ और नहीं बस प्यार और प्यार,



जनवरी 18, 2014

समंदर



समंदर के किनारे
दूर तक फैली रेत पर 
ताड़ के पेड़ से पीठ टिका 
मैं  देखता रहा सोचता रहा
विराट में छुपे कितने संकेत, 

हज़ारो मील दूसरे किनारे पर 
अपने अस्तित्व को समेटे 
गहराई में कहीं विलीन होते
पिघलते हुए लाल सूरज को, 

बच्चों का पेट भरने निकले
दिन भर की मशक्कत से लौटते
घोसलों तक पहुँचने की जल्दी में 
परवाज़ें भरते हुए परिंदों को,

समंदर के बीचो-बीच से कहीं
जोश और तरंग से उठती
सब बहा ले जाने की उम्मीद में 
साहिल पर दम तोड़ती लहरों को,   

रेत में भी जड़ों को समेटे 
गीली हवाओं में सिहरते 
आनंद से झूमते और गाते 
स्वयं में ही लीन इन पेड़ों को,

कहीं जन्म-जन्म के वादे करते 
एक दूसरे में सिमटते हुए लोग  
तो कहीं अकेले बैठे आँसू बहाते
सूनी आँखों से तकते  हुए लोग,

समंदर के किनारे
दूर तक फैली रेत पर 
ताड़ के पेड़ से पीठ टिका 
मैं  देखता रहा सोचता रहा
विराट में छुपे कितने संकेत, 

© इमरान अंसारी  

दिसंबर 23, 2013

शक्ति



आँखों में कितने ख्वाब मचलते थे 
हसरतों के दिल में चिराग जलते थे,

झक सफ़ेद एक घोड़े पर सवार 
ख्वाबो का वो सब्ज़ शहज़ादा 
एक रोज़ कहीं दूर से आएगा 
अपने साथ मुझे भी ले जायेगा,

हाय ! कितनी नादाँ थी कितनी भोली मैं 
कच्ची उम्र में बिठा दी गयी डोली में मैं,
बैठी शर्म से सकुचाई फूलों की सेज पर
आते ही रखी थी उसने बोतल मेज पर,

लड़खड़ा रहे थे कदम मुँह से छूटता भभूका था 
खसोटा ज़ालिम ने जैसे भेड़िया कोई भूखा था,
अब तो यही स्वर्ग और यही देवता था मेरा 
यही संस्कृति थी और यही अब धर्म था मेरा,

रीती-रिवाज़ों के बंधन में जकड़ी गई 
कैसे-कैसे और कहाँ-कहाँ मैं पकड़ी गई,
जिसके लिए रखती रही करवा-चौथ
उसने सीने पर बिठा दी लाकर सौत,

मासूम बच्चों की आँखों को देखती रही 
इनका क्या दोष है बस ये सोचती रही, 
हर ज़ुल्म इसलिए चुपचाप सहती रही
दरिया में तिनके कि तरह मैं बहती रही,

पूछती रब से तूने तो जग को बनाया 
इस जग ने तो जननी को ही भुलाया,
सुन कर बात मेरी वो धीरे से मुस्काया 
बोला तूने भी तो अपनी शक्ति को भुलाया,

मत भूल तुझे भी मैंने वो सब दिया है
जिस पर इतराता ये पुरुष जिया है,
देख उठा कर शास्त्रो और पुराणो को 
मारा है शक्ति ने कितने हैवानों को,

भस्म हुए है जिस पर तूने नज़र डाली है 
सिर्फ कोमलांगी नहीं तुझमे भी काली है,
झुक जाती सबके आगे तुझमे वो भक्ति है
और दुष्टों का संहार करे तुझमे वो शक्ति है,  
     
© इमरान अंसारी    

अक्टूबर 28, 2013

लाज



इस खुबसूरत पेंटिंग को देखकर दिल से निकले कुछ ख्याल :-

नैनो में डाल के कजरा 
केशों में बाँध के गजरा,
बल खा के चली मैं आज
जग से मोहे आती है लाज,

पनघट पे खड़ा होगा बैरी
तोड़ेगा फिर गगरी मोरी,
मरती हैं जिस पर सभी गोरी 
करता है जो माखन की चोरी, 

वेणु पर लिए वो मधुर तान 
होठों पर एक मंद मुस्कान, 
झुक जाएगी पलके लाज से 
छोड़ेगा नैनो से ऐसे बान, 

मेरे इस जीवन का अंग है आधा 
वो मेरा कृष्णा , मैं उसकी राधा 

© इमरान अंसारी

जुलाई 25, 2013

एकालाप

प्रिय ब्लॉगर साथियों,

आज पहली बार हिंदी में कविता लिखने का प्रयास किया है......आपके समक्ष  ये कविता आलोचना के लिए भी प्रस्तुत है आप पाठकों से (अनीता जी, अमृता जी और निहार रंजन से खास) अनुरोध है कि जो भी कमी-बेशी नज़र आए उसे निसंकोच कहें........ ये मुझे आगे अधिक अच्छा लिखने की प्रेरणा देगा.........

एक बात और है मेरे ब्लॉग के पुराने मित्र / पाठकों को मैं ये बताना चाहता हूँ कि अब इस ब्लॉग पर सिर्फ मेरी अपनी लिखी हुई रचनाएँ ही पोस्ट होती हैं जो पिछले काफी अरसे से नियमित हैं पुरानी पोस्टें जो मेरे द्वारा लिखित नहीं थी और ब्लॉग पर प्रकाशित की गईं थी वो सारी मैंने इस ब्लॉग से अब हटा दी हैं और आगे भी अच्छा या बुरा जैसा भी है जज़्बात पर सिर्फ मेरा अपना लिखा हुआ ही मिलेगा........बात इमानदारी की थी और है इसलिए आज ये सूचना आप सबको दी ......उम्मीद है कि आप लोग हमेशा कि तरह हौसला-अफज़ाई करते रहेंगे । तो पेश है ये हिंदी कविता..............
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रात्रि की ये निस्तब्ध नीरवता 
नभ में फैली चन्द्र की शीतलता,

सरिता का प्रवाह भी कैसा मंद है 
परन्तु हृदय की कली अभी बंद है,

विचारों से दूषित अभी ये मन है  
पतझड़ में घिरा अभी उपवन है,

अभी काम, क्रोध, घृणा और द्वेष है
धरता ये मन तरह-तरह के भेष है,

मित्रता, स्नेह और प्रेम के बंधन हैं 
बढ़ते पाँवों की ये भी एक जकड़न हैं, 

दूरगामी पथ पर चलता एक पथिक 
जीवन क्या है और इससे अधिक,

विस्तृत होता हर दिशा में विरोधाभास 
कैसे अनुभूत करूँ मैं भीतर की सुवास, 

क्षीण ही सही पर होता है ये आभास 
पूर्ण होगा स्वयं को पाने का प्रयास, 

क्या ये एक विक्षिप्त का प्रलाप है
अथवा ये केवल मेरा एकालाप है,