सितंबर 27, 2012

जोगी



जबसे देखी है झलक मैंने तेरी
बन गया हूँ तब से मैं तेरा जोगी,

तेरे रहम का हूँ तलबगार कबसे
बख्श देगा तो रहमत तेरी होगी,

पा लूँगा जब खुद में तेरा वजूद
हाथों में तब क़ायनात सारी होगी  

लगा है जबसे ये इश्क़ वाला रोग
बीमार हूँ तेरा, दुनिया कहे रोगी,

कैसे झेलूँगा तेरे जलवों की ताब
जब तुझसे मुलाक़ात मेरी होगी,

झुका दी है अब तेरे क़दमों में ख़ुदी 
कभी तो बारिश तेरे नूर की होगी,  

नहीं भटकोगे तुम कभी रास्ता
    साथ तुम्हारे उसकी रहनुमाई होगी,  

40 टिप्‍पणियां:

  1. उत्तर
    1. बहुत बहुत शुक्रिया आपका निवेदिता जी।

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  2. पा लूँगा जब खुद में तेरा वजूद
    हाथों में तब कायनात सारी होगी !
    वाह,बहुत सुन्दर !

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    1. बहुत बहुत शुक्रिया ज्ञानचंद जी।

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  3. उत्तर
    1. बहुत बहुत शुक्रिया अनुपमा जी।

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  4. साथ उसकी रहनुमाई...फिर कैसा डर ! बहुत ही बढ़िया

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  5. आपकी यह बेहतरीन रचना शनिवार 29/09/2012 को http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जाएगी. कृपया अवलोकन करे एवं आपके सुझावों को अंकित करें, लिंक में आपका स्वागत है . धन्यवाद!

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    1. बहुत बहुत शुक्रिया यशोदा जी हलचल पर हमारी पोस्ट शामिल करने के लिए ।

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  6. खुदी को खोकर ही खुदा मिलता है..उम्दा..

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  7. खुदी को बुलंद करना, झुकाना भी है।
    क्या करूँ? मुझे तेरा नूर पाना भी है।

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  8. तेरे रहम का हूँ तलबगार कबसे
    बख्श देगा तो रहमत तेरी होगी,,,,,

    ऐसा ही होता है इश्क के रोगी को
    जोगी बनना ही पडता है ,,,,,,,कमाल की रचना,,,

    RECENT POST : गीत,

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  9. बहुत ही दिलकश...
    "पा लूँगा जब खुद में तेरा वजूद,हाथों में तब कायनात सारी होगी "
    उम्दा भाव...|

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  10. अध्यात्म की राह का जोगी , नहीं भटकेगा गर उसकी रहनुमाई होगी !
    बढ़िया !

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  11. आज तो मेरे मन के भावों को आकार दे दिया।

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  12. लाज़वाब! सदैव की तरह एक उत्कृष्ट गज़ल...

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  13. वाह जी...
    बहुत बढ़िया रचना...
    :-)

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  14. झुका दी है अब तेरे क़दमों में ख़ुदी
    कभी तो बारिश तेरे नूर की होगी,


    और जिसके इश्क में आप जोगी बन रहे है वो एक दिन कहेगी

    नी मैं जाना जोगी दे नाल,
    जब से मैं जोगी की होई, मुझे में मैं ना बाकि रह गयी कोई :-)

    http://duaari.blogspot.in

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    1. बहुत बहुत शुक्रिया आपका......हम तो खुदा के इश्क में ही जोगी बन बैठे हैं :-)

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  15. सुंदर भाव ! एक बार उसकी राह में जो चल पड़ता है राह खुदबखुद बनती जाती है...

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    1. शुक्रिया अनीता जी सच कहूँ तो आपकी टिप्पणी के बिना मेरी पोस्ट अधूरी सी लगती है :-)

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  16. बहुत सुन्दर रचना .इमरान जी .... वास्तव में उस एक का साथ हो तो फिर किसी और की क्या ज़रूरत!

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जो दे उसका भी भला....जो न दे उसका भी भला...