दिसंबर 17, 2013

दीवानी



छलक न पड़े इनमें से दर्द कहीं इसलिए
आँखों को काजल से सजाकर रखती थी,

मिलते ही चला न जाये दिल का करार 
इसलिए नज़रों को झुकाकर रखती थी, 

पहचान न ले कहीं चेहरे से ये ज़माने वाले  
प्यार को मेरे सीने में दबाकर रखती थी,

नहीं कर पाई होठों से इक़रार इश्क़ का मगर 
तस्वीर मेरी किताबों में छुपाकर रखती थी,

अजीब दीवानी सी लड़की थी वो 'इमरान'
इंतज़ार में तेरे पलकें बिछाकर रखती थी,


10 टिप्‍पणियां:

  1. इमरान मियाँ , अब उन नाजुक पलकों को ज्यादा देर तक बिछवाए न रहें..

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  2. ऐसे ह्रदय में ही तो सच्चा प्यार स्थित होता है. अति सुन्दर कृति.

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  3. लेकिन खबर ही न हुई थी तब इस दिल को...

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  4. कोमल एहसासों से सजी सुंदर रचना।

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  5. वाह !! बहुत सुंदर रचना ....

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  6. इंतज़ार में पलकें बिछाना ... असल प्रेम का एहसास होना ...
    कोमल नाज़ुक पलों से पिरोई गज़ल .. भावपूर्ण शेर ....

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  7. आप सभी कद्रदानों का तहेदिल से शुक्रिया |

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जो दे उसका भी भला....जो न दे उसका भी भला...