नवंबर 19, 2013

साहिल



आज भी जा बैठती हूँ 
सागर के उसी साहिल पर 
जहाँ बैठे घंटो हम दूर 
अस्त होते सूरज को 
निहारा करते थे, 

इन लहरों पर कितनी ही 
प्यार भरी अठखेलियाँ 
किया करते थे हम दोनों,

इसी सागर पर किश्ती 
पर बैठे हमने कितनी ही 
मौजों का सामना किया
एक दूसरे का हाथ थामे,

एक दिन एक बड़ी सी 
मौज तुम्हे सागर के 
दूसरे किनारे तक ले गई 
क्योंकि एक दिन तुम्हे 
महत्वकांक्षा के जहाज पर 
बैठकर इस सागर के 
सीने को कुचलना था,

जानती हूँ उस किनारे से 
इस किनारे तक तैर के आना 
अब तुम्हारे लिए मुमकिन नहीं 
और जहाज़ पर बैठना मेरे लिए,

फिर भी मैं इस इंतज़ार में 
रोज़ इस साहिल पर आती हूँ
कि शायद कोई मौज तुम्हें 
उस किनारे से बहाकर फिर 
इस किनारे तक ले आये,


14 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत खूबसूरती से इंतजार को बयान किये हो भाई

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  2. आधी बात तो चित्र ने ऐसे कह ही दिया और बाकी जो शब्दों ने कहा वो दिल को छू दिया..बहुत ही सुन्दर लिखा है..

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  3. बहुत खूबसूरत दिल के जज्बातों का सफ़र .....

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  4. स्नेह सच्चा हो तो सागर हो या परलोक, आस का दीया जलता ही रहता है. वो मिलन मूर्त हो या अमूर्त. विरह का बहुत सुन्दर वर्णन.

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  5. फिर भी मैं इस इंतज़ार में
    रोज़ इस साहिल पर आती हूँ
    कि शायद कोई मौज तुम्हें
    उस किनारे से बहाकर फिर
    इस किनारे तक ले आये,
    ......... वाह बहुत खूब ... अनुपम भाव संयोजन

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  6. प्रतीक्षा का अपना आनन्द है...क्या हर किसी को यहाँ ऐसी ही किसी शै का इंतजार नहीं जो उसे पता है मिलने वाली नहीं...

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  7. इंतज़ार की एक कहानी बुनती हुई लाजवाब नज़्म ...
    चाहत को रोकना मुश्किल होता है ... जानते हुए भी की लौटना संभव नहीं होता उस पार से ... वो साहिल पे इंतज़ार करती है ...

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  8. बहुत सुन्दर भावपूर्ण रचना...

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  9. बहोत खूब इमरान...!!!

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  10. वाह ...बहुत सुंदर ...

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  11. first of all a lot of thanks to you to add me in your top 10 list. due to some busy schedule, i could not read your blog, this post is outstanding....................



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  12. आप सभी कद्रदानों का तहेदिल से शुक्रिया |

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  13. वाह! इसके बाद की दो कविताएँ भी पढ़ीं। यह अधिक अच्छी लगी।

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