फ़रवरी 27, 2013

कस्तूरी


जहाँ कहीं जिस ओर भी इशारा मिला
उसी तरफ उसे ढूँढता रहा बढ़ता रहा 
कभी इससे पूछता तो कभी उससे 
कहीं कोई सुराग नहीं मिलता था 
दूसरे तो जैसे अंजान थे उससे,

ये ख़ुशबू सिर्फ उसे ही आती 
दिल-ओ-दिमाग पर छा जाती  
एक मदहोशी का आलम बनता  
कुछ देर अपने को भी भूल जाता 

जहाँ भी वो जाता उसके साथ होती 
ढूँढने पर न जाने कहाँ खो जाती
यहाँ वहाँ जाने कहाँ कहाँ ढूँढा उसे 
जिसने जो बताया वही किया उसने 

एक रोज़ थक कर बैठ गया वो 
बंद करके आँखें देखा अपने भीतर
जो उसे पागल बनाये दे रही थी 
वो खुशबू तो थी उसके अपने ही अन्दर 

अब उसने जाना वो तो सदा से थी
बस वही कभी उसे जान नहीं पाया 
वो खुशबू जो उसे एक मामूली से 
'कस्तूरी' बनाती है सदा के लिए,
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नोट - ये पोस्ट मैंने दोनों को ख्याल में ले कर लिखी है 'हिरन' और 'मनुष्य' जो आपको भाए आप वो मतलब लें ले । इसलिए कहीं पर भी दोनों का ही ज़िक्र नहीं किया है.......प्रयास कैसा रहा.....आपकी अमूल्य राय की प्रतीक्षा में.......


28 टिप्‍पणियां:

  1. यह रचना कुछ उस गीत तरह है देखा न आँखों में बस पलकों के नीचे थे....भावपूर्ण अभिव्यक्ति

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  2. सच में हम अपने अन्दर ही झांकना भूल जाते हैं...बहुत गहन और सुन्दर प्रस्तुति..

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  3. Bahut khub bhaiya...
    ''Jo tu sar ko jhukanaa sikh le...Jo dhundhti hai aankhen teri,wo hai tere andar hi...''

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    1. आपके द्वारा दी गई सभी टिप्पणीयों के लिए ह्रदय से आपका आभारी हूँ।

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  4. सच में भीतर झांकें तो सब मिल जाता है...... गहरी अभिव्यक्ति

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  5. अपने आप को पाना ही तो अंतिम सत्य है ... इंसान भटकता है कस्तूरी की तलाश में ओर अंत तक वो उसे नहीं मिलती ... अपने अंदर जो होती है ...
    गूढ़ भाव लिए सुन्दर रचना ...

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  6. जो है,वह भीतर है .... पर कस्तूरी की तरह हम उसे बाहर ढूंढते हैं

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  7. bahut khoob imran ji,
    kasturi to hamare ander hi hein,bus use khojna hi jivan hein.
    ye savat sach bht sunderta se bayan kiya hein.

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  8. बस कल्पना और सच में इतना ही फासला है

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  9. इसी की तलाश ही तो हमें भटकाती रहती है , लगता है वो मिला पर कुछ चुक-सी होती रहती है. अच्छा लिखा है .भला आप लिखे और हमें अच्छी न लगे , ऐसा हो नहीं सकता है ...जी .

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  10. अपने सुख की तलाश के लिए अपने भीतर उतरना ज़रूरी होता है...
    लेकिन इंसान सपने सुख को संसार में खोजता रहता है....कभी किसी वस्तु में,कभी किसी व्यक्ति में और कभी संबंधों में.....और भटकता रहता है वस्तु,व्यक्ति और संबंधों के बीच...! अगर खुद संतुष्ट हो जाये अपनी स्थिति और परिस्थिति से तो ये भटकाव...ये खोज उसी क्षण समाप्त हो जाती है....गौतम भी न जाने कहाँ कहाँ इसकी खोज में घूमते रहे...और जिस क्षण उनको इसकी अनुभूति हुई...भगवत्ता उनके समीप आ गई और बुद्धत्व को प्राप्त हुए....! हम कुछ भी छोड़ना नहीं जानते हैं..सिर्फ पकड़ना ही जानते हैं...चाहे वो वस्तु हो,व्यक्ति हो या कोई सम्बन्ध....और फिर इनको पकड़ने में सब हाथ से छूट जाता है...यहाँ तक कि हम खुद को भी खो देते हैं...! सब हमारे भीतर ही है...लेकिन जब तक सांसारिक वासना के पीछे भागते रहेंगे...खुद को पाना मुश्किल हो जाता है...!
    शुक्रिया भाई...इतना अच्छा लिखने के लिए..और मुझे यहाँ तक लाने के लिए....!!
    लिखना और जीना...दो अलग बातें हैं...!
    जो हम कहते हैं...और जो हम जीते हैं...जब एक हो जाते हैं ...तो आपके शब्दों का जुड़ाव सीधे दिल से होता है...इसीलिए कई बार सीधे-साधे शब्द दिल को कहीं गहरे तक छू जाते हैं और अच्छी भाषा शैली और संजोये-पिरोये शब्द भी बस हमारे दिमाग को एक संतुष्टि देते हैं...दिल को कहीं भी नहीं छू पाते हैं....!!
    ढेर सा आशीर्वाद और प्यार.....!
    खुश रहो हमेशा....और अपने पास आने वालों को भी खुशी बाँटो...!!

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    1. बिलकुल सहमत हूँ दी लेखन तभी सफल है जब वो अनुभवों से निकलता है और सीधे दिल तक पहुँचता है...........इतनी सुन्दर व्याख्यात्मक टिप्पणी के लिए तहेदिल से शुक्रिया........स्नेह बनाये रखें :-)

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  11. जो अपने पास है ,उसकी खोज में
    बाहर भटकना मनुष्य की विडंबना
    है ,आपके ब्लॉग पर पहली बार
    आना सार्थक रहा ,शुक्रिया..........

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    1. खुशामदीद......बहुत बहुत शुक्रिया ब्लॉग तक आने और अपनी अमूल्य टिप्पणी देने का.......स्नेह बनाये रखें।

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  12. वाह, सार्थक प्रस्तुति.

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  13. सुन्दर भावपूर्ण प्रस्तुति...बहुत बहुत बधाई...

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  14. सुंदर लिखा , मानो रचना भी कस्तूरी सी महक उठी है

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जो दे उसका भी भला....जो न दे उसका भी भला...