मैं डरा-डरा सहमा सा
शाम के धुंधलके में.........
जैसे ही अपने 'आज' को
पोटली में समेटकर
चार कोस आगे आने वाले
'कल' की ओर लेकर चलता हूँ,
कि तभी अतीत के अँधेरे से
निकलने वाले काले साए
मुझे चारों तरफ से घेर लेते हैं,
और मुझ पर जानलेवा हमला करके
मेरी पोटली से वो मेरा 'आज' चुराकर
फिर से अतीत के अंधेरों में ग़ुम हो जाते हैं,
हर रोज़ ही ये कहानी
खुद को दोहराती है.......
बड़ी मशक्कत से मैं रोज़
एक नया 'आज' कमाता हूँ
और रोज़ ही अतीत के वो काले साए
मुझसे मेरा आज छीन के ले जाते हैं,
और मैं रोज़ मिलने वाले ज़ख्मों
को भर कर फिर से निकलता हूँ
जिंदगी कि सख्त राहों पर,
इस उम्मीद में कि कभी न कभी मैं
अतीत के सायों से अपने 'आज' को
महफूज़ बचाकर चार कोस पर
आने वाले 'कल' तक ले जाउँगा
क्योंकि कहते हैं वहाँ जो सूरज
एक बार निकलता है
वो फिर कभी नहीं डूबता
उस के उजाले में अतीत के
काले सायों से सदा के लिए
छुटकारा मिल जाता है,
मैं डरा-डरा सहमा सा
शाम के धुंधलके में..............
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