सितंबर 09, 2013

बचपन



जिंदगी का वो हसीं दौर लौटा दे 
ए ! वक़्त मुझे मेरा बचपन लौटा दे……

जब माँ के आँचल में छुप जाता था
जब न किसी गम से मेरा नाता था,

जिंदगी का वो हसीं दौर लौटा दे 
ए ! वक़्त मुझे मेरा बचपन लौटा दे……

जब आगे निकल जाने की होड़ न थी 
जब दुनिया की ये पागल दौड़ न थी,

जिंदगी का वो हसीं दौर लौटा दे 
ए ! वक़्त मुझे मेरा बचपन लौटा दे……

जब पल में रूठना और पल में मनाना था 
जब दोस्ती का खुबसूरत वो ज़माना था, 

जिंदगी का वो हसीं दौर लौटा दे 
ए ! वक़्त मुझे मेरा बचपन लौटा दे………

जब मोहल्ले से आती शिकायतें थी 
जब हुआ करती मासूम शरारतें थी, 

जिंदगी का वो हसीं दौर लौटा दे 
ए ! वक़्त मुझे मेरा बचपन लौटा दे……

जब तोड़ते पेड़ों से बेर, अमरुद और आम थे 
जब रखते एक दूसरे के कैसे-कैसे नाम थे, 

जिंदगी का वो हसीं दौर लौटा दे 
ए ! वक़्त मुझे मेरा बचपन लौटा दे……

जब धूप, बारिश, आँधी सब झेला करते थे 
जब सुबह से शाम तक बस खेला करते थे, 

जिंदगी का वो हसीं दौर लौटा दे 
ए ! वक़्त मुझे मेरा बचपन लौटा दे……

अगस्त 31, 2013

तामीर


अपनी हसरतों के गारे से 
उम्मीदों की ईंटों की चुनाई कर 
यकीन की बुनियाद पर 'रिश्तों'
की ईमारत तामीर की थी मैंने,  

इश्क के छप्पर तले  
कई सुनहले दिन और 
कई खवाबों भरी रातें
कितने सुकूँ से बीती थी,

पर एक रात जब खुद को 
दुनिया के गम से महफूज़ समझ 
मैं गफलत की नींद सो रहा था 
तभी वक़्त का ज़लज़ला उठा 

जिसने यकीन की बुनियाद को 
जड़ से हिला कर रख दिया  
पल भर में ईमारत धूल में मिल गई 
और मैं मलबे के नीचे कहीं दब गया,

बामुश्किल बाहर आ सका, मेरे आलावा 
मेरा कुछ भी बाकी न बचा,
भीड़ अपनी-अपनी इमारतें बचाने में लगी रही 
शिकायतों और सलाहों से भरी आवाजें गूँजती  
वजह बुनियाद का कमज़ोर होना था 
या फिर कच्चे गारे की वो चुनाई 
जो एक ही बारिश में दरक गई थी,

समझाया लोगों ने कि यूँ मायूस न हो 
फिर से कोशिश करो और एक 
नई बुनियाद पर नयी ईमारत तामीर होगी,        

और मैं अपने ज़ख्मों को कुरेदता
दिल में ये सोचता रहा कि हम 
इन्हें बनाते रहेंगे और वक़्त गिराता रहेगा 
यहाँ बनी सभी कच्ची-पक्की इमारतें 
एक न एक दिन धूल में मिल जानी हैं,

तब से ये आसमान ही मेरे सर की छत है 
और ये ज़मीं मुझे अपने आगोश में लेकर 
दुनिया के हर फ़िक्र-ओ-गम से महफूज़ रखती है,
जब खोने को कुछ बाकी न बचा 
तब मुझे वो मिला जो कभी नहीं खोता…….

पिंजड़ों में परवाज़ें नहीं हुआ करती 
उसके लिए पंखों का खुलना ज़रूरी है,

अगस्त 17, 2013

पूरे चाँद की अधूरी रात



वो पूरे चाँद की एक अधूरी सी रात,
जो जिंदगी में ठहर सी गई है,  

वो दरिया का किनारा 
पूरे चाँद की नीली सी रौशनी 
जो दरिया के पानी पर हिचकोले लेती 
दूर तक तैरती चली जाती थी,

उसके साथ-साथ वक़्त 
और हम भी बहते रहे, 
इस एक आखिरी मुलाक़ात में 
एक लम्बी ख़ामोशी के दरमियाँ 
तुम्हारे होंठ कुछ कहने के लिए 
कई बार काँपते रह गए,

और मैं जान के भी अनजान 
गुमसुम सा पानी के उठते 
बुलबुलों को एकटक देखता 
दिल में उनकी लम्बी जिंदगी 
की दुआ माँगता रहा…….

हमारा प्यार भी तो ऐसा ही था,
वक़्त का तेज़ बहाव आज इसे 
अपने साथ बहा ले जाएगा,
लरज़ते हाथो से तुमने अपना 
हाथ मेरे हाथ में लेकर 
हमेशा के लिए विदा माँगी थी,

उस रोज़ तुमने कहा था 
हम इस दरिया के दोनों 
किनारे जैसे ही हैं जो...... 
एक दूसरे के बिना मुक़म्मल नहीं 
एक दूसरे से जुदा भी नहीं,
पर जिनका कभी मिलन नहीं होता, 
  
वो पूरे चाँद की एक अधूरी सी रात,
जो जिंदगी में ठहर सी गई है,  

       

अगस्त 05, 2013

करम


बहुत सख्त हो कर भी टूट जाता है दरख़्त 
बचता है वही जो अन्दर से कुछ नरम हो, 

कोई किसी का दुश्मन न रहे जहाँ में  
काश के दुनिया में एक ऐसा धरम हो, 

मिलेगी तुझे भी पाक सुराही से शराब 
शर्त है ये मगर की प्यास तेरी चरम हो,

बच जाता है वो शख्स गुनाहों से अक्सर 
बाकी जिसके अन्दर थोड़ी सी शरम हो,

अपनी तलाश निकालती है गौतम*को बाहर 
दुनिया की ऐश से भरा चाहें उसका हरम हो, 

सवालिया निशान लगते हैं तेरे वजूद पर भी 
दिखा अपना जलवा दूर दुनिया का भरम हो, 

मंजिल खुद तुम्हें ढूँढ लेगी एक रोज़  'इमरान' 
तेरे मौला का बस एक तुझ पर जो करम हो, 

----------------------------------------------------------
*गौतम* - यहाँ आशय गौतम बुद्ध से है । 

जुलाई 25, 2013

एकालाप

प्रिय ब्लॉगर साथियों,

आज पहली बार हिंदी में कविता लिखने का प्रयास किया है......आपके समक्ष  ये कविता आलोचना के लिए भी प्रस्तुत है आप पाठकों से (अनीता जी, अमृता जी और निहार रंजन से खास) अनुरोध है कि जो भी कमी-बेशी नज़र आए उसे निसंकोच कहें........ ये मुझे आगे अधिक अच्छा लिखने की प्रेरणा देगा.........

एक बात और है मेरे ब्लॉग के पुराने मित्र / पाठकों को मैं ये बताना चाहता हूँ कि अब इस ब्लॉग पर सिर्फ मेरी अपनी लिखी हुई रचनाएँ ही पोस्ट होती हैं जो पिछले काफी अरसे से नियमित हैं पुरानी पोस्टें जो मेरे द्वारा लिखित नहीं थी और ब्लॉग पर प्रकाशित की गईं थी वो सारी मैंने इस ब्लॉग से अब हटा दी हैं और आगे भी अच्छा या बुरा जैसा भी है जज़्बात पर सिर्फ मेरा अपना लिखा हुआ ही मिलेगा........बात इमानदारी की थी और है इसलिए आज ये सूचना आप सबको दी ......उम्मीद है कि आप लोग हमेशा कि तरह हौसला-अफज़ाई करते रहेंगे । तो पेश है ये हिंदी कविता..............
----------------------------------------------------
रात्रि की ये निस्तब्ध नीरवता 
नभ में फैली चन्द्र की शीतलता,

सरिता का प्रवाह भी कैसा मंद है 
परन्तु हृदय की कली अभी बंद है,

विचारों से दूषित अभी ये मन है  
पतझड़ में घिरा अभी उपवन है,

अभी काम, क्रोध, घृणा और द्वेष है
धरता ये मन तरह-तरह के भेष है,

मित्रता, स्नेह और प्रेम के बंधन हैं 
बढ़ते पाँवों की ये भी एक जकड़न हैं, 

दूरगामी पथ पर चलता एक पथिक 
जीवन क्या है और इससे अधिक,

विस्तृत होता हर दिशा में विरोधाभास 
कैसे अनुभूत करूँ मैं भीतर की सुवास, 

क्षीण ही सही पर होता है ये आभास 
पूर्ण होगा स्वयं को पाने का प्रयास, 

क्या ये एक विक्षिप्त का प्रलाप है
अथवा ये केवल मेरा एकालाप है,